कांग्रेस अध्यक्ष बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को राजनीति में लेकर आए, लेकिन जिम्मेदारी देने में चूक गए। वह प्रियंका को जिम्मेदारी के लिहाज से आधे उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) में उन्हें समेट दिया। चुनाव में प्रत्याशी बनाने की चुनौती भी नहीं दे पाए। प्रियंका को केवल एक चुनाव प्रचार का टूल बनाए रखा। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रियंका ने अपनी भूमिका बहुत जिम्मेदारी से निभाई, लेकिन ऐसा कई बार लगा कि उनके पास अच्छे सलाहकार नहीं हैं।
मसलन प्रियंका का यह कहना है कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में वोट काटने के लिए मैदान में है। प्रचार के दौरान भी ऐसा कई बार एहसास हुआ कि प्रियंका के पास जिम्मेदारी बड़ी है, दांव पर बहुत कुछ है और उनके पास इस हिसाब से समय कम है। लिहाजा प्रियंका बड़ी हड़बड़ी में हैं। यहां तक कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में देश के अन्य हिस्सों में आसानी से जीत सकने वाली सीटों को भी फोकस नहीं कर पाई।
- कांग्रेस अध्यक्ष के पास चार बड़े मुद्दे थे। पहला वादा था कि कांग्रेस की सरकार बनने पर देश के 20 प्रतिशत गरीब परिवार को हर साल 72 हजार देंगे।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कॉरपोरेट घरानों का भला करते हैं, उन्होंने अनिल अंबानी की जेब में 30 हजार करोड़ रुपये डाले, चौकीदार चोर है।
सूत्र का कहना है कि राहुल गांधी का बड़ा फोकस इन्हीं मुद्दों पर रहा। वह इसी को दोहराते रहे। जबकि किसान का कर्जा माफ और चौकीदार चोर के मुद्दे पर राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में सत्ता में आ चुकी थी। कहने का अर्थ यह कि कांग्रेस अध्यक्ष कुछ नया नहीं ला पाए। कुछ नया मुद्दा खड़ा नहीं कर पाए। वह भाजपा के राष्ट्रवाद के मुकाबले बौने नजर आए। चुनाव प्रचार के दौरान उच्चतम न्यायालय के राफेल लड़ाकू विमान सौदे से जुड़े मामले की सुनवाई पर उन्होंने गलत बयान भी दिए। विश्लेषकों का मानना है कि इससे राहुल की छवि को धक्का लगा और इसका असर कांग्रेस पार्टी पर भी पड़ा।
लोकसभा चुनाव से करीब एक साल पहले सबसे पुरानी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी ने विपक्षी एकता का सुर्रा छोड़ा। कांग्रेस अध्यक्ष ने इसे खुद कहा। एकमात्र मोदी सरकार को सत्ता में आने से रोकने का नारा दिया और चुनाव के करीब आने तक विपक्षी एकता बिखर गई। सूत्र का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष अपने सलाहकारों में फंसे रहे। उन्हें अपनी खराब जमीन का अंदाजा भी नहीं रहा।
नेता और राजनीतिक दल की इमेज बिल्डिंग का काम करने वाले अजय मेहता कहते हैं बिहार, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में मजबूत भाजपा ने झुककर अपने सहयोगियों को मनाया। उन्हें अपने में शामिल किया। जद(यू) को 17 सीटें देकर, भाजपा खुद बिहार में 17 पर लड़ी। उत्तर प्रदेश में निषाद पार्टी, अपना दल को मनाया और साथ लड़ी।
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के जहर भरे बोल को नजरअंदाज किया, लेकिन कांग्रेस पार्टी न तो बड़ा दिल दिखा पाई, न विपक्षी एकता का संदेश दे सकी और न ही कोई बड़ा नारा देने में सफल रही। यहां तक कि गुजरात और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में सोशल मीडिया पर असरदार बनी कांग्रेस लोकसभा चुनाव में धराशायी नजर आई।
यह हमला कांग्रेस पार्टी के ही एक पूर्व महासचिव का है। उन्होंने कहा कि प्रचार और मीडिया के लिए कांग्रेस पार्टी ने जो रणनीति अपनाई थी, वह उसकी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। पार्टी अध्यक्ष खुद देश के प्रधानमंत्री को लगातार, बार-बार चीख-चीख कर चोर कह रहा है। पार्टी का मीडिया प्रभारी खुद इसी राह पर आक्रामक है। देश के शीर्ष नेतृत्व के ऊपर ओछी टिप्पणी हो रही है। वह भी बिना कोई ठोस आधार खड़ा किए। सूत्र का कहना है कि केवल धारणा बनाने की कोशिश के बल पर बिना आधार खड़ा किए चाहे राष्ट्रवाद का मुद्दा हो या भ्रष्टाचार का, किसानों का हो या युवाओं की बेरोजगारी का, लोकतंत्र में सफलता नहीं मिल सकती।
पार्टी के पूर्व महासचिव का कहना है कि कांग्रेस ऐसे समय में इसे चुनाव जीतने का आधार बना रही है, जब सत्ता पक्ष कांग्रेस से कहीं अधिक न केवल सावधान है, बल्कि धारणा बनाने के राजनीतिक दांव-पेच में उतरा है। कभी कांग्रेस के बड़े नेता रहे एक अन्य सूत्र के अनुसार आप दूसरे की लकीर मिटाकर या फिर एक लकीर को पीटकर बड़े नेता नहीं बन सके। इसके लिए लोकतंत्र में दूसरे के राजनीतिक स्पेस के मुकाबले अपना स्पेस बनाना पड़ता है। कांग्रेस अध्यक्ष यहां चूक गए हैं।