सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिए स्थायी निकाय की स्थापना पर जोर दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह निकाय के बारे में तीन महीने के भीतर रिपोर्ट दाखिल करे।
न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ ने कहा कि चूंकि उपभोक्तावाद का सार संविधान में अंतर्निहित है। इसलिए उपभोक्ता निकाय को कर्मचारियों, सदस्यों और अध्यक्षों के लिए कार्यकाल आधारित कार्यालयों से भरने का कोई कारण नहीं है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के कार्यान्वयन में खामियों का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि सरकार को को निर्देश दिया जाता है कि वह तीन महीने की अवधि के भीतर उपभोक्ता विवादों के लिए एक स्थायी न्यायिक मंच की व्यवहार्यता पर एक हलफनामा दायर करे, चाहे वह उपभोक्ता न्यायाधिकरण या उपभोक्ता अदालत के रूप में हो।
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न्यायालय ने कहा कि इसमें स्थायी सदस्य होंगे, जिनमें कर्मचारी और पीठासीन अधिकारी दोनों शामिल होंगे। केंद्र इसका नेतृत्व करने के लिए वर्तमान न्यायाधीशों को सुविधा प्रदान करने पर विचार कर सकता है। सदस्यों की संख्या को पर्याप्त रूप से बढ़ाया जा सकता है। पीठ ने मौजूदा स्थिति में परिवर्तन के साथ सुधार करने का निर्णय केंद्र सरकार के विवेक पर छोड़ दिया, लेकिन स्थायी ढांचे की जरूरत पर जोर दिया।
कोर्ट ने कहा कि उपभोक्ता निकाय को स्थायी कर्मचारियों और अधिकारियों के माध्यम से स्थायित्व दिया जा सकता है। न्याय प्रशासन करने वाले कार्यालय से जुड़ी कार्यकाल की सुरक्षा, उसकी दक्षता और कार्यक्षमता को बढ़ाती है। किसी निश्चित कार्यकाल के लिए किसी कार्यालय में नियुक्त कोई भी व्यक्ति उतना प्रेरित नहीं होगा जितना कि स्थायी आधार पर नियुक्त व्यक्ति होता है।
आदेश में कहा गया कि अस्थिरता से निर्णयों की गुणवत्ता प्रभावित होगी। इससे उपभोक्ताओं को नुकसान होगा। एक उपभोक्ता की अपेक्षा होती है कि वह संबंधित उपभोक्ता फोरम से गुणवत्तापूर्ण और समय पर निर्णय प्राप्त करे। ऐसा निर्णय उपभोक्तावाद की अवधारणा का सबसे अच्छा साधन है। हमारा मानना है कि उपभोक्ता फोरम के कार्यकाल में सुधार के लिए मानसिकता में बदलाव लाने का समय आ गया है।
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कोर्ट ने कहा कि स्थायित्व से उपभोक्तावाद की अवधारणा को विकसित करने और बढ़ाने में काफी मदद मिलेगी। केंद्र इस मुद्दे की बारीकी से जांच करेगा और उचित कार्रवाई करेगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि गलती करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने का प्रावधान मौजूदा कानूनी ढांचे का हिस्सा है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दिए गए प्रावधान के समान कोई स्पष्ट तंत्र उपलब्ध नहीं है। इस मोड़ पर हमारा सुझाव है कि भारत सभी स्तरों पर उपभोक्ता मंचों की ताकत बढ़ाने पर विचार कर सकता है।