ईओएस-05 क्या है?
ईओएस-05 एक अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है। इसका मुख्य काम अंतरिक्ष से पृथ्वी की इमेजिंग करना है। इसका वजन करीब 2367 किलोग्राम है। ईओएस-05 को खासतौर पर जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से पृथ्वी की इमेजिंग के लिए तैयार किया गया है। इस ऑर्बिट में पहुंचने के बाद सैटेलाइट पृथ्वी के एक बड़े क्षेत्र को बार-बार देख सकेगा। इस मिशन को एनएसआईएल ने एक रणनीतिक उपयोगकर्ता के लिए समर्पित लॉन्च के तौर पर किया है। इसके साथ भारत और दूसरे देशों के उपयोगकर्ताओं के 18 सह-यात्री सैटेलाइट भी भेजे गए हैं।
इमेजिंग क्या होती है?
इमेजिंग का मतलब यहां सिर्फ पृथ्वी की सामान्य तस्वीर लेना नहीं है। सैटेलाइट में लगे सेंसर पृथ्वी की सतह से मिलने वाली जानकारी को रिकॉर्ड करते हैं। इस डेटा को प्रोसेस करके पृथ्वी की तस्वीर और उससे जुड़ी जरूरी जानकारी तैयार की जाती है।
इससे किसी इलाके की जमीन की स्थिति, वनस्पति में बदलाव, फसलों की वृद्धि और आपदा से प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है।
उदाहरण के लिए, किसी इलाके में बाढ़ आने पर सैटेलाइट की तस्वीरों से पता लगाया जा सकता है कि पानी कितने क्षेत्र में फैला है। इसी तरह जंगल में आग लगने पर प्रभावित इलाके और आग के फैलाव की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है।
कृषि के क्षेत्र में इमेजिंग से फसलों की वृद्धि और वनस्पति की स्थिति पर नजर रखने में मदद मिल सकती है। वहीं, पर्यावरण के क्षेत्र में जमीन और वनस्पति में समय के साथ हो रहे बदलावों को समझा जा सकता है।
जीएसएलवी-एफ17 क्या है?
जीएसएलवी-एफ17 भारत के जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी जीएसएलवी की 19वीं उड़ान है। इसकी लंबाई करीब 51.7 मीटर और लिफ्ट-ऑफ मास करीब 420.5 टन है।
इसे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर के सेकंड लॉन्च पैड से लॉन्च किया गया। रॉकेट के ऊपर 4 मीटर व्यास वाली ओगिव कंपोजिट पेलोड फेयरिंग लगी है, जिसके अंदर ईओएस-05 को रखा गया था।
जीएसएलवी-एफ17 के तीन स्टेज कैसे काम करते हैं?
जीएसएलवी-एफ17 में तीन मुख्य स्टेज हैं। पहला स्टेज यानी जीएस-1 में एस-139 और चार एल-40एच शामिल हैं। लॉन्च के समय इनके इग्निशन से थ्रस्ट पैदा होता है और रॉकेट तेजी से ऊपर बढ़ता है।
पहले स्टेज का काम पूरा होने के बाद जीएस-1 सेपरेशन होता है। इसके बाद दूसरा स्टेज यानी जीएस-2 सक्रिय होता है। इसमें जीएल-40एचटी का इस्तेमाल किया गया।
दूसरे स्टेज के अलग होने के बाद तीसरा स्टेज यानी जीएस-3 सक्रिय हुआ। इसे सीयूएस-15 कहा जाता है। इसमें तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन का इस्तेमाल होता है।
तीसरे स्टेज का काम पूरा होने के बाद ईओएस-05 को निर्धारित सब-जीटीओ में स्थापित किया गया।
ऑर्बिट क्या होती है?
ऑर्बिट यानी अंतरिक्ष में वह तय रास्ता, जिस पर कोई सैटेलाइट पृथ्वी के चारों तरफ घूमता है। सैटेलाइट को किसी खास ऑर्बिट में स्थापित करने के लिए उसकी ऊंचाई, गति और दिशा को सटीक तरीके से तय किया जाता है।
सैटेलाइट का काम किस तरह का है, इसी के हिसाब से उसकी ऑर्बिट चुनी जाती है। पृथ्वी के करीब रहने वाले सैटेलाइट आमतौर पर ज्यादा बारीक तस्वीरें ले सकते हैं, लेकिन वे पृथ्वी की सतह के मुकाबले तेजी से आगे बढ़ते हैं। वहीं ज्यादा ऊंचाई वाली ऑर्बिट में मौजूद सैटेलाइट पृथ्वी के बड़े हिस्से को देख सकते हैं। ईओएस-05 को बड़े क्षेत्र की ज्यादा लगातार निगरानी के लिए जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में पहुंचाया गया है।
जीएसएलवी-एफ17 ईओएस-05 को सीधे उसकी अंतिम जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में नहीं पहुंचाता। पहले इसे सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट यानी सब-जीटीओ में स्थापित किया जाता है।
यह एक अंडाकार यानी एलिप्टिकल ऑर्बिट होती है। इसमें सैटेलाइट एक बिंदु पर पृथ्वी के सबसे करीब और दूसरे बिंदु पर पृथ्वी से काफी दूर होता है।
ईओएस-05 के लिए इस ऑर्बिट की पेरिजी करीब 170 किलोमीटर और एपोजी करीब 28,934 किलोमीटर है। पेरिजी वह बिंदु है जहां सैटेलाइट पृथ्वी के सबसे करीब होता है, जबकि एपोजी वह बिंदु है जहां वह पृथ्वी से सबसे दूर होता है।
सब-जीटीओ ईओएस-05 की अंतिम ऑर्बिट नहीं है। यह वह शुरुआती ट्रांसफर ऑर्बिट है, जहां तक रॉकेट सैटेलाइट को पहुंचाता है। इसके बाद सैटेलाइट अपने प्रोपल्शन सिस्टम की मदद से आगे की यात्रा पूरी करता है।
सैटेलाइट अपनी अंतिम ऑर्बिट तक कैसे पहुंचेगा?
जीएसएलवी-एफ17 से अलग होने के बाद ईओएस-05 का काम खत्म नहीं होता। सैटेलाइट अपने अंदर मौजूद प्रोपल्शन सिस्टम के इंजन को कई बार चलाएगा।
इससे उसकी गति और ऑर्बिट में बदलाव होगा। धीरे-धीरे उसकी ऑर्बिट की ऊंचाई बढ़ेगी और उसका आकार भी बदलेगा। इस प्रक्रिया के बाद ईओएस-05 अपनी अंतिम जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट तक पहुंचेगा।
इस तरह जीएसएलवी-एफ17 का काम सैटेलाइट को सब-जीटीओ तक पहुंचाना है, जबकि अंतिम ऑर्बिट तक पहुंचने का बाकी काम ईओएस-05 अपने प्रोपल्शन सिस्टम की मदद से पूरा करता है।
जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट क्या होती है?
जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट ऐसी ऑर्बिट है, जिसमें सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने की गति के साथ तालमेल बनाता है। पृथ्वी अपने अक्ष पर एक चक्कर करीब 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड में पूरा करती है। जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में सैटेलाइट की कक्षीय अवधि भी लगभग इतनी ही होती है।
पृथ्वी की सतह से करीब 35,786 किलोमीटर की ऊंचाई पर ऐसी ऑर्बिट में सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने के साथ तालमेल बनाए रख सकता है।
अगर सैटेलाइट की ऑर्बिट भूमध्य रेखा के ऊपर पूरी तरह गोलाकार हो और वह पृथ्वी के घूमने की दिशा में उसी अवधि से घूमे, तो पृथ्वी से देखने पर वह लगभग एक ही जगह दिखाई देता है। ऐसी विशेष जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट को जियोस्टेशनरी ऑर्बिट कहा जाता है।
ऐसे सैटेलाइट किनके पास हैं?
- अमेरिका: जीओईएस श्रृंखला के सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से पृथ्वी की लगातार इमेजिंग करते हैं।
- जापान: हिमावारी-8 और हिमावारी-9 से मौसम और पृथ्वी की निगरानी होती है।
- चीन: फेंगयुन श्रृंखला के जियोस्टेशनरी मौसम सैटेलाइट मौजूद हैं।
- दक्षिण कोरिया: जीईओ-केओएमपीएसएटी श्रृंखला के सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से इमेजिंग करते हैं।
- यूरोप: यूरोप की ईयूएमईटीएसएटी संस्था मेटियोसैट सैटेलाइट संचालित करती है।
- भारत: इंसैट श्रृंखला के जियोस्टेशनरी सैटेलाइट पहले से मौसम संबंधी इमेजिंग करते हैं; ईओएस-05 की खासियत यह है कि यह भारत का पहला जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से इमेजिंग करने वाला अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है।
भारत के आगे के बड़े अंतरिक्ष मिशन कौन से हैं?
गगनयान: गगनयान भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम है। इसके तहत तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को करीब 400 किलोमीटर की ऑर्बिट में तीन दिन के मिशन पर भेजने की योजना है।
कार्यक्रम को जनवरी 2019 में मंजूरी मिली थी। सितंबर 2024 में इसका दायरा बढ़ाकर कुल 8 मिशन किया गया। आपकी दी हुई जानकारी के मुताबिक पहला बिना इंसान वाला परीक्षण मिशन 2026 की चौथी तिमाही में और मानव मिशन 2027 तक लक्षित है।
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन: भारत पांच मॉड्यूल वाला भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन विकसित कर रहा है। इसका पहला मॉड्यूल बीएएस-01 को 2028 तक लॉन्च करने और पूरे स्टेशन को 2035 तक चालू करने का लक्ष्य है।
इसका इस्तेमाल लंबे समय तक इंसानों को अंतरिक्ष में रखने, माइक्रोग्रैविटी में वैज्ञानिक शोध और उन्नत अंतरिक्ष अभियानों के लिए किया जाएगा।
स्पैडेक्स-2 और स्पैडेक्स-3: इन मिशनों में अंतरिक्ष में डॉकिंग और अनडॉकिंग तकनीक को आगे बढ़ाया जाएगा। इसके तहत अंतरिक्ष यानों को आपस में जोड़ने और अलग करने के साथ सैंपल ट्रांसफर, क्रू ट्रांसफर और पावर, फ्लूड तथा प्रोपेलेंट ट्रांसफर जैसी क्षमताओं को विकसित किया जाएगा।
इन तकनीकों का इस्तेमाल भविष्य के चंद्रयान-4, गगनयान और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसे मिशनों में किया जा सकता है।
शुक्रयान: शुक्रयान यानी वीनस ऑर्बिटर मिशन को मार्च 2028 में लॉन्च करने का लक्ष्य है। यह शुक्र ग्रह की भूगर्भीय संरचना, वायुमंडल और आयनमंडल का अध्ययन करेगा। मिशन में एरोब्रेकिंग और थर्मल मैनेजमेंट जैसी उन्नत तकनीकों का भी प्रदर्शन किया जाएगा।