इसरो ने माइक्रोसेट-आर को अंतरिक्ष में पहुंचाने वाले पीएसएलवी-सी44 का निर्माण करने में भी एक नई उपलब्धि हासिल कर ली। बृहस्पतिवार को पहली उड़ान भरने वाले इस चार चरण ईंधन वाले रॉकेट का निर्माण महज 30 दिन के अंदर किया गया, जबकि इससे पहले तैयार किए गए पीएसएलवी सीरीज के सभी रॉकेट बनाने में लंबा समय लगा था।
44 मीटर लंबे पीएसएलवी-सी44 रॉकेट पर पहली बार इसरो ने महज दो स्ट्रेप-ऑन प्रणाली (बूस्टर) लगाई थीं, जबकि आमतौर पर पीएसएलवी सीरीज के रॉकेट छह स्ट्रेप-ऑन बूस्टर के साथ उड़ान भरते रहे हैं या उन पर कोई भी बूस्टर नहीं लगाया जाता था।
इसरो की तरफ से बताया गया कि माइक्रोसेट-आर को करीब 274 किलोमीटर दूर स्थापित करते हुए पृथ्वी की सबसे निचली कक्षा में सैटेलाइट भेजने का कारनामा भी संगठन ने पहली बार किया।
कलामसेट बनी रॉकेट के चौथे चरण वाली पहली सैटेलाइट
माइक्रोसेट-आर के साथ उड़ान भरने वाली कलामसेट सैटेलाइट आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में बेहद उपयोगी साबित होने वाली है। कुछ कॉलेज छात्रों और चेन्नई के एक संगठन स्पेस किड्ज इंडिया के सदस्यों द्वारा महज 12 लाख रुपये में बनी कलामसेट के नाम भी एक रिकॉर्ड दर्ज हो गया।
वह पीएसएलवी रॉकेट के ईंधन के चौथे चरण में उड़ान भरने वाली पहली भारतीय सैटेलाइट बन गई। स्पेस किड्ज के सीईओ श्रीमाथी केसान ने बताया कि 6 साल से चल रही परियोजना के तहत कलामसेट का निर्माण नैनो सैटेलाइट के कम्युनिकेशन सिस्टम को समझने के लिए किया गया, लेकिन यह प्रायोगिक सैटेलाइट बहुत सारे क्षेत्रों में उपयोगी साबित होगी। बताया कि इस सैटेलाइट का निर्माण करीब 6 साल लंबी परियोजना के तहत किया गया है।