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ISRO: इसरो और आईआईटी गुवाहाटी को मिली बड़ी कामयाबी, ब्लैकहोल से निकलने वाले एक्स-रे संकेतों को किया डिकोड

Mon, 18 Aug 2025 08:22 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दुनिया भर के शोधकर्ता ब्लैक होल की घटना को समझने की दिशा में काम कर रहे हैं। ब्लैक होल ने निकलने वाली किरणों और एक्स-रे पैटर्न को समझने में आईआईटी गुवाहाटी और इसरों के वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है। 
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ब्लैक होल - फोटो : Freepik
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विस्तार
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान और आईआईटी गुवाहाटी ने बड़ी सफलता हासिल की है। आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों ने यूआर राव सैटेलाइट सेंटर इसरो और हाइफा विश्वविद्यालय इस्राइल की मदद से पृथ्वी से लगभग 28,000 प्रकाश वर्ष दूर मौजूद एक ब्लैक होल से निकलने वाले एक्स-रे संकेतों को डिकोड किया है। भारत की अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसैट से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग करते हुए शोधकर्ताओं ने ब्लैक होल से निकलने वाली एक्स-रे चमक को चमकीले और मंद चरणों के बीच बदलते हुए देखा। बदलाव की प्रक्रिया का हर चरण कई सौ सेकंड तक चला।
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दुनिया भर के शोधकर्ता ब्लैक होल की घटना को समझने की दिशा में काम कर रहे हैं। ब्लैक होल अपने साथी तारों की बाहरी परतों से गैस खींचते समय अधिक ऊष्मा उत्पन्न करते हैं और एक्स-रे उत्सर्जित करते हैं। इन एक्स-रे का अध्ययन करके, वैज्ञानिक ब्लैक होल के आसपास के वातावरण के बारे में जान सकते हैं। आईआईटी गुवाहाटी के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर संतब्रत दास ने बताया कि हमें एक्स-रे की तेज चमक का पहला प्रमाण मिला है, जो स्रोत के उच्च-चमक वाले चरणों के दौरान प्रति सेकंड लगभग 70 बार दोहराया गया। दिलचस्प बात यह है कि ये तेज झिलमिलाहटें कम चमक वाले चरणों के दौरान गायब हो जाती हैं। यह नई उपलब्धि एस्ट्रोसैट की शक्तिशाली अवलोकन क्षमता के कारण संभव हुई है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि ब्लैक होल से निकलने वाली एक्स-रे चमक दो अलग-अलग चरणों के बीच बारी-बारी से बदलती रही, इसमें एक चमकीली थी और एक मंद थी। चमकीली अवस्थाओं के दौरान जब झिलमिलाहट सबसे अधिक होती है तो कोरोना अधिक सघन और काफी गर्म हो जाता है। इसके विपरीत मंद अवस्थाओं के दौरान यह फैलता और ठंडा होता है। इससे झिलमिलाहट गायब हो जाती है।
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उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट सहसंबंध सघन, दोलनशील कोरोना को इन तेज संकेतों के संभावित स्रोत के रूप में इंगित करता है। प्रत्येक चरण कई सौ सेकंड तक चलता है और एक नियमित पैटर्न में दोहराया जाता है। एक तेज टिमटिमाता संकेत केवल चमकदार चरण के दौरान ही दिखाई देता है। इस खोज से पता चलता है कि ब्लैक होल के चारों ओर का कोरोना एक स्थिर संरचना नहीं है और ब्लैक होल में गैसों के प्रवाह के आधार पर इसका आकार और ऊर्जा बदलती रहती है।

प्रोफेसर दास ने बताया कि यह शोध ब्लैक होल के किनारे पर मौजूद अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण तीव्रता और उच्च तापमान के बारे में बताता है। ये निष्कर्ष ब्लैक होल के विकास, ऊर्जा उत्सर्जन और उनके परिवेश पर उनके प्रभाव के हमारे मॉडल को भी बेहतर बनाते हैं। यह इस बात के भी संकेत देता है कि ब्लैक होल संपूर्ण आकाशगंगाओं के विकास को कैसे प्रभावित कर सकते हैं। इसरो के यूआरएससी के अनुज नंदी ने कहा कि हमारा अध्ययन एक्स-रे झिलमिलाहट की उत्पत्ति के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करता है। हमने पाया है कि यह झिलमिलाहट ब्लैक होल के आसपास के कोरोना में मॉड्यूलेशन से जुड़ी है। यह शोध पत्र मंथली नोटिसेज ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। 
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