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गरीब सवर्ण को आरक्षण चुनावी जुमला न बन जाए?

Mon, 07 Jan 2019 10:08 PM IST
अमर शर्मा शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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narendra modi
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वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट द्वारा गरीब सवर्ण को 10 प्रतिशत आरक्षण के फैसले को सबका साथ, सबका विकास बताया है। विपक्ष इसे 2019 के आम चुनाव में अगड़ी जाति का वोट पाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का एक और जुमला करार दे रहा है। अंदरखाने से खबर है कि बिहार, उ.प्र., म.प्र., राजस्थान समेत तमाम राज्यों में खिसक रही राजनीतिक जमीन को केंद्र में रखकर केंद्र सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र के समाप्त होने से पहले यह निर्णय लिया है। मंगलवार आठ जनवरी को केंद्र सरकार इस मुद्दे पर राज्यसभा में बिल भी पेश कर सकती है। 
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उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद केटीएस तुलसी इसके विरोध में खुलकर आ गए हैं। तुलसी का कहना है कि यह फैसला सिर्फ लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए हैं। उन्होंने कहा कि गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी। सरकार सामान्य बिल पारित नहीं करा पा रही है और ऐसे में संविधान संशोधन पर संसद की मंजूरी कोई आसान काम नहीं है। केटीएस तुलसी के अनुसार सरकार का यह निर्णय जनता के साथ मजाक है। 

बसपा के वरिष्ठ नेता और उच्चतम न्यायालय के वकील सतीश चंद्र मिश्र ने कहा कि पहले बिल का कोई प्रूप आए, तब वह प्रतिक्रिया दे सकते हैं। समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव ने भी कोई प्रतिक्रिया देने से परहेज किया। राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने इसे भाजपा की तीन राज्यों में हुई पराजय और 2019 में पार्टी की खिसक रही जमीन के कारण केंद्र सरकार में पैदा हुई घबराहट बताया।

क्यों कैबिनेट ने लिया निर्णय?

बसपा प्रमुख मायावती काफी पहले से गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का मुद्दा उठाती रही हैं। सवर्णों में एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की हैं, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। इस वर्ग की सामाजिक और आर्थिक दशा लगातार बिगड़ रही है। यह वर्ग एक बड़ा वोट बैंक भी है। ब्राह्मम, क्षत्रिय, भूमिहार, कायस्थ समेत तमाम जातियां इसके दायरे में आएंगी। 
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हाल में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दल भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। भाजपा की सबसे बड़ी चिंता उ.प्र., बिहार, झारखंड, म.प्र., राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तराखंड  को लेकर है। इन्ही राज्यों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत दिलाया था। इन्ही राज्यों में भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा है। इन्हीं राज्यों में भाजपा का सबसे बड़ा वोटबैंक भी सवर्ण ही हैं। समझा जा रहा है कि संसद के प्रस्तावित शीतकालीन सत्र के समापन से ठीक एक दिन पहले सवर्ण वोट बैंक को बांधे रखने के लिए केंद्र सरकार ने यह निर्णय लिया है। 

उदित राज ने भी दिया यह प्रस्ताव

उदित राज

बढ़ाया राजनीतिक दबाव

केंद्र सरकार ने गरीब सवर्ण को आरक्षण देने के लिए कैबिनेट में निर्णय लेकर राजनीतिक दलों पर दबाव बढ़ा दिया है। इसका असर उत्तर भारत के सभी राजनीतिक दलों पर साफ देखा जा रहा है। कोई भी दल गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का विरोध करने से बच रहा है। इसके लिए राजनीतिक दल संविधान और उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों का हवाला देकर सरकार के निर्णय की आलोचना कर रहे हैं। यहां तक कि समाजवादी पार्टी, बसपा भी अभी कुछ बोलने से बच रही है।

क्या है सरकार के प्रस्ताव में

वह सवर्ण जिसकी आमदनी 8 लाख रुपये सालाना से कम हो, उसके पास पांच एकड़ से कम जमीन हो, 1000 स्क्वायर फीट से कम में मकान हो या निगम में आवासीय प्लाट 1000 स्वायर यार्ड से कम हो या फिर निगम के बाहर 209 स्वायर यार्ड से कम हो। 

कहा जा रहा है कि इसके लिए संविधान में आरक्षण की सीमा 49.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 59.5 किया जाएगा। सरकार इस प्रस्ताव में गांव, कस्बा और शहर में रहने वाले सवर्ण की एक बहुत आबादी का ध्यान रखा गया है। 

एक प्रस्ताव यह भी

भाजपा सांसद उदित राज ने मांग की है कि जातिगत आधार पर जनसंख्या कराई जानी चाहिए। इस जनसंख्या को आधार बनाकर देश में मौजूद विभिन्न जातियों, वर्गों को उनकी संख्या के आधार पर आरक्षण देना चाहिए। इस तरह से आरक्षण की सीमा को 49.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत तक कर देना चाहिए। ताकि जिसकी जितनी आबादी हो, उसको उसी हिसाब से नौकरी मिले और आरक्षण को लेकर इस तरह की किचकिच हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। 
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क्या है अड़चन?

Narendra Modi - फोटो : PTI
-केंद्र सरकार यह पहल आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण के लिए करना चाहती है।

-अभी तक आरक्षण देने की व्यवस्था में आर्थिक आधार नहीं है।

-आरक्षण का मुख्य आधार सामाजिक आर्थिक रुप से पिछड़े वर्ग का है।

-आरक्षण का आर्थिक आधार और इसका दायरा 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन की आवश्यकता पड़ेगी। संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत होना अनिवार्य है। इस बदलाव के बाद ही सरकार आरक्षण के स्वरूप में कोई बदलाव कर सकेगी या फिर गरीब सवर्णों को आरक्षण दे सकेगी।

-आरक्षण में आर्थिक आधार को केंद्र में लाने पर अनूसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के क्रीमी लेयर को इससे बाहर रखने के संदर्भ में भी दबाव पड़ेगा।

-बिल संसद के प्रस्तावित शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन लाने की ही संभावना शेष है। इसके बाद सरकार बजट सत्र में पूरक बजट लेकर आएगी और फिर लोकसभा चुनाव 2019 में चली जाएगी। बजट सत्र में सरकार के पास कोई इस तरह का बिल लाने का अधिकार नहीं रहेगा।

-राज्यसभा में संविधान संशोधन बिल लाने के पहले सरकार को अपना प्रस्ताव पेश करना पड़ेगा। उसे गरीब को सवर्ण को आरक्षण देने संबंधी बिल का मसौदा लाना पड़ेगा। प्रक्रिया के अनुसार यह पहले समिति को भेजा जाएगा। इस तरह से केंद्र सरकार के इस कार्यकाल में इसका राज्यसभा में पारित होना संभव नहीं है। इसी तरह से लोकसभा में भी राह आसान नहीं है। पूर्व राज्यसभा महासचिव वीके अग्निहोत्री भी अभी इसे चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया प्रयास मान रहे हैं।

बिल राज्यसभा में ही क्यों?

राज्यसभा में बिल प्रस्तुत किए जाने के बाद उसकी वैधानिकता समाप्त नहीं होती। क्योंकि राज्यसभा का कार्यकाल कभी खत्म नहीं होता। ऐसे में संभावना है कि केंद्र सरकार इस बिल को राज्यसभा में ही प्रस्तुत करे। वहीं लोकसभा में प्रस्तुत करने पर वर्तमान लोकसभा कार्यकाल खत्म होने के साथ ही इस बिल की वैधानिकता भी समाप्त हो जाएगी। ऐसे में माना जा रहा है कि केंद्र सरकार इस बिल को राज्यसभा में लाकर लंबे समय तक एक मुद्दा के रूप में जीवित रखना चाहती है।
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