वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट द्वारा गरीब सवर्ण को 10 प्रतिशत आरक्षण के फैसले को सबका साथ, सबका विकास बताया है। विपक्ष इसे 2019 के आम चुनाव में अगड़ी जाति का वोट पाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का एक और जुमला करार दे रहा है। अंदरखाने से खबर है कि बिहार, उ.प्र., म.प्र., राजस्थान समेत तमाम राज्यों में खिसक रही राजनीतिक जमीन को केंद्र में रखकर केंद्र सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र के समाप्त होने से पहले यह निर्णय लिया है। मंगलवार आठ जनवरी को केंद्र सरकार इस मुद्दे पर राज्यसभा में बिल भी पेश कर सकती है।
उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद केटीएस तुलसी इसके विरोध में खुलकर आ गए हैं। तुलसी का कहना है कि यह फैसला सिर्फ लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए हैं। उन्होंने कहा कि गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी। सरकार सामान्य बिल पारित नहीं करा पा रही है और ऐसे में संविधान संशोधन पर संसद की मंजूरी कोई आसान काम नहीं है। केटीएस तुलसी के अनुसार सरकार का यह निर्णय जनता के साथ मजाक है।
बसपा के वरिष्ठ नेता और उच्चतम न्यायालय के वकील सतीश चंद्र मिश्र ने कहा कि पहले बिल का कोई प्रूप आए, तब वह प्रतिक्रिया दे सकते हैं। समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव ने भी कोई प्रतिक्रिया देने से परहेज किया। राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने इसे भाजपा की तीन राज्यों में हुई पराजय और 2019 में पार्टी की खिसक रही जमीन के कारण केंद्र सरकार में पैदा हुई घबराहट बताया।
क्यों कैबिनेट ने लिया निर्णय?
बसपा प्रमुख मायावती काफी पहले से गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का मुद्दा उठाती रही हैं। सवर्णों में एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की हैं, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। इस वर्ग की सामाजिक और आर्थिक दशा लगातार बिगड़ रही है। यह वर्ग एक बड़ा वोट बैंक भी है। ब्राह्मम, क्षत्रिय, भूमिहार, कायस्थ समेत तमाम जातियां इसके दायरे में आएंगी।
हाल में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दल भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। भाजपा की सबसे बड़ी चिंता उ.प्र., बिहार, झारखंड, म.प्र., राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तराखंड को लेकर है। इन्ही राज्यों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत दिलाया था। इन्ही राज्यों में भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा है। इन्हीं राज्यों में भाजपा का सबसे बड़ा वोटबैंक भी सवर्ण ही हैं। समझा जा रहा है कि संसद के प्रस्तावित शीतकालीन सत्र के समापन से ठीक एक दिन पहले सवर्ण वोट बैंक को बांधे रखने के लिए केंद्र सरकार ने यह निर्णय लिया है।