चीन के भारत में राजदूत सुन वेडोंग ने नया पासा फेंका है। सुन वेडोंग ने लद्दाख में तनाव भड़काने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति एक-दूसरे के इलाके में घुसपैठ के कारण पैदा हुई है।
चीन सीमा विवाद के मामले में न केवल भारत बल्कि दक्षिण चीन सागर से लेकर अपने सभी 14 पड़ोसी देशों के साथ शतरंज के घोड़े की तरह ढाई कदम आगे और फिर दो कदम पीछे चलने की रणनीति अपनाता है।
यह नीति उसके विस्तारवादी सोच का बड़ा हथियार है। ताजा मामला भूटान, भारत, चीन का ट्राईजंक्शन क्षेत्र डोकलाम है। यह भूटान का क्षेत्र है। भारत के सामरिक महत्व से जुड़ा है और इसकी रक्षा भूटान से संधि के आधार पर भारत करता है।
यहां भी चीन ने यही रणनीति अपनाई। वह पहले आगे आया, 73 दिन तक भारतीय सैनिकों के साथ चीनी सेना आमने-सामने रही। इसके बाद 200 मीटर पीछे हटा। स्थाई सैन्य संरचना खड़ी की और अब 100 मीटर आगे बढ़ आया है।
इसी नीति उसने नेपाल की 36 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा कर लिया है। ऐसा ही व्यवहार अरुणाचल प्रदेश में कर रहा है। यही स्थिति लद्दाख में करता रहा है। कभी डेपसांग में मोर्चा खोलता है, कभी चुमार में।
इस बार गलवां नदी घाटी में घुसपैठ करके नया मोर्चा खोला, पैंगोंग क्षेत्र में 8 किमी लंबाई तक स्थायी बंकर, सैन्य ठिकाने, निगरानी की व्यवस्था आदि कर ली। फिंगर 4 से नीचे फिंगर 3 तक दावा जता रहा है।
गोगरा पोस्ट, हॉट स्प्रिंग एरिया को अपना बता रहा है। इन सबके बीच में चीन के भारत में राजदूत सुन वेडोंग ने चीनी सैनिकों के आधे पर मान जाने की तान छेड़ दी है।
दरअसल चीन की मंशा ढाई कदम आगे, दो कदम पीछे की रणनीति को अपनाकर एलसीए (वास्तविक नियंत्रण रेखा) के प्रारुप को बदल देने की है। इस बहाने वह अक्साइ चिन इन इलाके को अपना बता देने की ठोस मान्यता ले लेना चाह रहा है।
ताकि भारत आगे अड़ंगा न लगाए और पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते से आने वाली 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' परियोजना निष्कंटक हो सके।
चोरी और सीना जोरी। चीन की इस तरह की धमकियां पाकिस्तान की धमकियों से कहीं आगे हैं। वहां का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स चीन के अधिकारियों के ईशारे पर युद्ध जैसे हालात के लिए तैयार रहने का संदेश देता है।
इसी तरह का संदेश डोकलाम विवाद के दौरान भी मिल रहा था। इस बार भी ग्लोबल टाइम्स ने डराया है। उसने संदेश देने की कोशिश की है भारत और चीन में युद्ध जैसी स्थिति आई तो नई दिल्ली को पाकिस्तान और नेपाल से भी कड़ी चुनौती मिलने वाली है।
हालांकि भारतीय रणनीतिकार सतर्क तो हैं लेकिन इसे बहुत गंभीरता से नहीं लेते।
भारत-चीन की आक्रामक घुसपैठ, सैन्य तैयारी, वक्तव्य देने की रणनीति के आगे खामोश रहने, लगातार तैयारी करते रहने की रणनीति पर चलता है। डोकलाम विवाद के समय भी भारत ने उसी रणनीति के तहत कूटनीतिक प्रयासों से मामले का हल खोजा था।
इस बार भी भारत खामोश है, लेकिन रणनीतिक तौर पर मामला अलग रूप लेता दिखाई दे रहा है। चीन में भारत के राजदूत विक्रम मिसरी ने पड़ोसी देश को आईना दिखाया है। विक्रम मिसरी ने विदेश मंत्रालय के रुख पर चलते हुए चीन को कूटनीतिक रूप से घेरने की कोशिश की है।
अभी तक भारत चीन के साथ इस तरह की स्थितियों से बचता रहा है। विक्रम मिसरी के चीन को दिए गए संदेश का काफी व्यापक अर्थ निकाला जा रहा है। सैन्य सूत्रों का कहना है कि इस बार चीन की रणनीति कामयाब नहीं हो पाएगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही कह चुके हैं कि भारत अपनी एक-एक इंच भूमि की सुरक्षा, देश की एकता एवं अखंडता के लिए प्रतिबद्ध है।
चीन लगातार भारत से लगी सीमा पर सैन्य जमावड़ा बढ़ा रहा है। लद्दाख क्षेत्र में सैन्य जमावड़ा बढ़ाने के साथ-साथ स्थाई सैन्य संरचना भी बढ़ा रहा है। चीन के सामानांतर भारत ने भी तोपों, टैकों, आर्टिलरी, इंफेंट्री के जवानों, हेलीकाप्टरों की संख्या बढ़ा दी है।
अपाचे और चिनूक हेलीकाप्टर, सखोई, जगुआर, मिराज, मिग फाइटर जेट, निगरानी के लिए ड्रोन समेत अन्य सक्रिय हैं। सेना के साथ वायुसेना लद्दाख क्षेत्र में तालमेल और समन्वय बढ़ाने का युद्धाभ्यास भी कर रही है।
चीन पर निगाह रखने के लिए मशीन और मनुष्य के कौशल पर आधारित खुफिया विंग बेहद सतर्क है। समझा जा रहा है भारत इसके बाबत कुछ सहयोगी देशों की सहायता भी ले रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों, द्विपक्षीय मसलों और विदेश नीति से जुड़े मामलों में कूटनीति ज्यादा काम करती है। ऐसे समय में कम से कम वक्तव्य और ज्यादा से ज्यादा सक्रियता कारगर हथियार होती है।
समझा जा रहा है कि चीन की आक्रामक रणनीति के सामानांतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल खामोश चल रहे हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस जयशंकर भी तोलकर बोल रहे हैं।
कुछ पिछली घटनाओं को याद करें तो आपरेशन बालाकोट हो या सर्जिकल स्ट्राइक-1 प्रधानमंत्री ने उसके काफी पहले से खामोशी ओढ़ ली थी।
हालांकि इसके सामानांतर दोनों देशों के सैन्य अधिकारी, सीमा विवाद और आपसी विवाद के मुद्दे निबटाने के लिए दोनों देशों में बना सहयोग एवं समन्वय कार्य समूह समाधान के लिए काम कर रहा है।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों, सैन्य कमांडर्स, राजनयिकों के प्रयास चल रहे हैं।
भारत से ज्यादा चीन के साथ विवाद पर अमेरिका प्रतिक्रिया दे रहा है। पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने सरगर्मी बढ़ाई। अब विदेश मंत्री माइक पोम्पियो चर्चा में हैं। पोम्पियो ने यूरोपीय देशों से अमेरिकी सेना के तैनाती की संख्या में कटौती करके इसे चीन से लगते क्षेत्र (एशिया) में तैनात करने का कारण भारत के साथ चीन की बढ़ रही तल्खी को बताया है।
चीन के चारों तरफ जापान के द्वीप से लेकर, ताइवान तक अमेरिका के सैनिक अड्डे हैं। करीब सवा दो लाख की सेना तैनात है। ताइवान में अमेरिका के दो न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर तो एक जापान के तटों पर तैनात है। युद्धाभ्यास कर रहा है।
मालदीव, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और जापान के करीब 10 बेसों से अमेरिका दक्षिण चीन सागर पर सीधी नजर रखता है। माना जा रहा है कि अमेरिका चीन के साथ अपने व्यापार युद्ध के साथ-साथ उसे एशिया में सीमित करने की नीति पर भी काम कर रहा है।
उसकी इस नीति के चलते ड्रैगन के हौसले पस्त हो सकते हैं। बहुत हद तक संभव है कि भारत अपने कुछ सहयोगी देशों से इस क्षेत्र में कूटनीतिक या अन्य सहायता लेकर चीन को जवाब देने की तैयारी कर रहा हो।