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क्या चीन के चंगुल में फंसा नेपाल बन रहा है भारत के लिए सिरदर्द?

Fri, 12 Jun 2020 07:50 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • आईएसआई के मकड़जाल में फंसने के बाद बहुत बदल गया नेपाल
  • आईएसआई, चीन का प्रभाव, वामपंथ के कॉकटेल ने खड़ी की नई चुनौती
  • 'नो मेंस लैंड' पर अतिक्रमण, मधेश में दुष्प्रचार, मस्जिदों, मदरसों की भाड़ ने बिगाड़ी फिजा
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Indo nepal border - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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विदेश नीति, कूटनीति, सैन्य नीति सब पर हावी स्थानीय नीति ने देखते-देखते भारत-नेपाल के बीच रिश्तों की रणनीति को पूरी तरह बदलकर रख दिया। तस्वीर कुछ ऐसी उभरी है कि भारत के छोटे भाई के तौर पर हर हिंदुस्तानी के दिल में बसे नेपाल में अब भारत का विरोध ही वहां का असली राष्ट्रवाद है।

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इसके राष्ट्र नायक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली हैं। विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस, भारत समर्थक मधेश पार्टियां सब अब भारत के विरोध के साथ खड़ी हैं।

यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेपाल की सांसद सरिता गिरि नेपाल की संसद में नए नक्शे का विरोध किया तो उनके घर पर अज्ञात लोगों ने हमला कर दिया है।

इतना ही नहीं नेपाल की पुलिस ने भारतीयों पर गोली चलाई और एक भारतीय की मौत हो गई है।

कूटनीति के जानकारों के माथे पर बल

पूर्व विदेश सचिव शशांक इसे काफी गंभीर मान रहे हैं। शशांक का कहना है कि नेपाल कहीं न कहीं भारत विरोधियों के हाथ में खेल रहा है। इसके सामानांतर भारत से कोई बड़ी चूक हो रही है।

नेपाल के साथ हमारी खुली सीमा है और इस तरह की स्थिति ठीक नहीं है। प्रो. सुखदेव मुनि (एसडी मुनि) भारत-नेपाल संबंध पर विशेष महारत रखते हैं।

प्रो. मुनि के अनुसार नेपाल से भारत को बातचीत करके संबंधों को सही दिशा देनी चाहिए। चीन मामलों के विशेषज्ञ स्वर्ण सिंह भी इसे काफी गांभीर विषय मान रहे हैं।

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इन सबके सामानांतर एक पूर्व खुफिया सूचना के अधिकारी का कहना है कि लंबे समय से नेपाल की अनदेखी अब काफी भारी पड़ रही है।

नेपाल दिखा रहा है 'लाल' आंखें

नेपाल से जो घटनाक्रम प्रकाश में आ रहे हैं, इसका स्वरूप पहली बार जैसा है। लिपुलेख, कालापानी, लिम्पियाधुरा को लेकर नेपाल का इस तरह से रवैया कभी नहीं रहा। प्रो. एसडी मुनि कहते हैं कि दोनों देशों (भारत और नेपाल) के पास अपने-अपने दावे को लेकर दस्तावेज के आधार पर कहने के लिए काफी कुछ है।

इसलिए इस समय संतुलित रुख की आवश्यकता है। पहली बार नेपाल ने भारत से सटी सीमा सेना तैनात करने का जोखिम उठाया है।

अब नेपाल आंखें दिखाकर कह रहा है कि वह भारत से संवाद के जरिए अपनी जमीन को वापस लेगा। नेपाल का इस तरह का बर्ताव तब है, जब पाकिस्तान से लगती जम्मू-कश्मीर सीमा पर स्थिति तनावपूर्ण चल रही है।

इससे भी महत्वपूर्ण है कि उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीन भारतीय सीमा के निकट अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। लद्दाख में भारत और चीन की सेना आमने सामने खड़ी है।

ऐसे समय में काठमांडू नई दिल्ली को आंखें दिखाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'सबसे पहले पड़ोसी' की नीति को चुनौती दे रहा है।  

नेपाल से है रोटी-बेटी का रिश्ता

नेपाल-भारत के रिश्ते सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक स्तर पर प्रगाढ़ रहे हैं। रोटी-बेटी का रिश्ता है। जम्मू-कश्मीर के महाराज हरि सिंह की पुत्रवधू और कर्ण सिंह की पत्नी नेपाल राजघराने से थीं।

ग्वालियर के दिवंगत महाराज माधव राव सिंधिया की पत्नी माधवीराजे भी नेपाल के राज घराने से ताल्लुक रखती हैं। राजामाता विजयाराजे सिंधिया की जड़े भी नेपाल से जुड़ी थीं।

नेपाल में सीतामाता का मंदिर, जानकीपुरम है। सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वाले लोगों की आपस में रिश्तेदारियां हैं। हिमालयन देश नेपाल से भारत का पौराणिक काल से संबंध रहा है।

टनकपुर से सिक्किम तक डराने लगा है नेपाल का बार्डर

टनकपुर से सिक्कम तक लगती नेपाल की सीमा के ताजा हालत अब डराने लगे हैं। खुफिया सूत्र बताते हैं कि पूरी नेपाल सीमा पर भारत और नेपाल की सीमा को दर्शाने वाले स्तंभ बड़ी संख्या में नष्ट कर दिए हैं। अब यह गिने-चुने और जीर्ण शीर्ण हालत में बचे हैं।

सीमा पर 'नो मेंस लैंड' पर अराजक गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं। इनमें मानव तस्करी, नशे के सामान, हथियारों की तस्करी जैसे तमाम गैरकानूनी काम बड़ी तेजी से फले फूले हैं।

बताते हैं पिछले कुछ सालों में सोनौली बार्डर से लेकर रक्सौल से लगती सीमा के रास्ते ही तमाम पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई समर्थित आतंकियों ने आत्मसमर्पण भी किया।

भटकल ब्रदर्स हों या अन्य। कश्मीर के कुछ आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों ने भी नेपाल का ही रास्ता चुना। इतना ही नहीं 'नो मेंस लैंड' का बड़ा हिस्सा भी अतिक्रमण का शिकार हो चुका है।

नेपाल की तरफ से दुकानें, बस्तियां सब खतरनाक मंसूबे के साथ बसाई जा चुकी हैं। हालांकि भारत-नेपास सीमा पर सीमा सशस्त्र बल निगरानी करता है, लेकिन बताते हैं इसके बावजूद पिछले 20 साल में बार्डर बहुत खंखरा हो चुका है।

आईएसआई, वामपंथ और अब चीन का भारत विरोध का दांव

काठमांडू में लंबे समय तक तैनात रहे विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी को 90 का दशक नहीं भूलता। बताते हैं 90 के दशक में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने नेपाल में अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी थीं।

इस पूरे प्रकरण में मिर्जा दिलशाद बेग नाम के शख्स ने काठमांडू से लेकर पोखरा तक पूरे नेपाल में भारत विरोधी जड़ों को जमाना शुरू कर दिया था।

बताते हैं मुंबई बम धमाके के कुछ गुनहगारों ने भी भागने के लिए नेपाल के रूट का सहारा लिया था। हालांकि बाद में अपराधिक गतिविधयों में लिप्त मिर्जा दिलशाद बेग की हत्या हो गई थी।

लेकिन उसके बाद नेपाल में भारत विरोधी बीज और तेजी से पनपने लगे। आज भारत-नेपाल सीमा पर बड़ी संख्या में मदरसा, मस्जिद, बस्तियां बस चुकी हैं। इसको लेकर खुफियां एजेंसियां लगातार दो-ढाई दशक से सरकार को अपनी रिपोर्ट दे रही हैं।

एक खुफिया अधिकारी कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की शह पर नेपाल में भारत विरोध शुरू हुआ। नेपाल के कम्युनिस्टों विचारधारा के आधार पर भारत के विरोध को आधार दिया।

अब चीन की शह, चीन के संसाधन, चीन के पैसे के बल पर पूरा भारत विरोध एक छत के नीचे आ गया है। बताते हैं इसकी अगुआई चीन ही कर रहा है।

सूत्र का कहना है कि हाल में चीन के एक दल ने भी भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र का दौरा किया था। इसका मुख्य मकसद भारत को नेपाल से अलग करके और नेपाल से सटी भारत की सीमा तक चीन की पहुंच बनाने का रोड मैप तैयार करना है।

इसलिए भारत के लिए नेपाल आने वाले समय में बड़ी चिंता बनता जा रहा है।

चीन की शह पर नेपाल दिखा रहा है आंखें

प्रो. एसडी मुनि के अनुसार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नेपाल से समीकरण बनाकर चल रहे हैं। भारत ने नेपाल के साथ अपनी सीमा सील करके वहां के लोगों को बड़े पैमाने पर नाराज होने का अवसर दे दिया।

जो कोशिशें पहले भारत के विरोध में चल रही थीं, सब साझा मंच तैयार करती दिखाई दे रही हैं। इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह ही नेपाल में प्रधानमंत्री ओली सबसे बड़े राष्ट्रवादी नेता बनकर उभरे हैं।

इस तरह से नेपाल में भारत का बढ़ता विरोध अच्छा संकेत नहीं है। केंद्र सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। प्रो. मुनि का भी मानना है कि अभी नेपाल जो कर रहा है, उसमें चीन की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।

पूर्व विदेश सचिव शशांक भी यही कहते हैं। ऐसे में संकेत यही हैं कि नेपाल में भारत का विरोध बढ़ता जाएगा और इससे भारत की स्थिति कमजोर होगी।

रणनीतिकारों का मानना है कि नेपाल के साथ इस तरह का रिश्ता लेकर नहीं चला जा सकता। हालांकि नेपाल के साथ भारत के तल्ख रिश्ते को लेकर विदेश मंत्रालय अभी कुछ कहने के पक्ष में नहीं है।

मंत्रालय के अधिकारी कहते हैं कि उनकी हर घटना पर बारीकी से नजर है। वह आंकलन कर रहे हैं और सही समय आने पर भारत-नेपाल के बीच में सामंजस्यपूर्ण रिश्ते दिखाई देंगे।

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