देश में ही किसानों की सूरजमुखी की फसल नहीं बिक पा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा देने से देश में फसल महंगी हो जाती है, जबकि प्राइवेट कंपनियां वही चीज विदेश से सस्ते में आयात कर लेती हैं....
तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के अलावा आंदोलनकारियों की अन्य प्रमुख मांग है कि सरकार फसलों की बिक्री को किसानों का वैधानिक अधिकार बनाए। यानी वे जितनी भी फसल बेचना चाहें, सरकार द्वारा उसकी खरीद सुनिश्चित की जाए। सरकारी या निजी दोनों प्रकार के बाजारों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद सुनिश्चित की जाए। परंतु क्या किसानों की यह मांग तर्क संगत है, और क्या सरकार के पास इतने वित्तीय संसाधन हैं कि वह किसानों की पूरी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद ले? कृषि विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है।
वहीं, प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ विजय सरदाना कहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सारी फसलों की खरीद को अनिवार्य बनाने से किसानों का भारी नुकसान होगा। प्राइवेट कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार खुला हुआ है। अगर किसी फसल की कीमत ज्यादा होती है तो कंपनियां इसे बाहर के खुले बाजार से करने लगेंगी, जिससे किसानों की फसलों की पूरी खरीद नहीं हो पाएगी और इससे उनका ज्यादा नुकसान होगा।
वे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि आज मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है। लेकिन खुले बाजार में इसकी कीमत 900 से 1100 रुपये के बीच ही मिल रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि प्राइवेट कंपनियों को बेहतर गुणवत्ता की मक्का अंतरराष्ट्रीय बाजार में 1100 रुपये में उपलब्ध है। यही कारण है कि किसानों की फसल इससे ज्यादा कीमत में नहीं बिक पा रही है।
उन्होंने कहा कि देश में लगभग 70 फीसदी खाद्यान्न तेल आज भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदा जा रहा है, लेकिन देश में ही किसानों की सूरजमुखी की फसल नहीं बिक पा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा देने से देश में फसल महंगी हो जाती है, जबकि प्राइवेट कंपनियां वही चीज विदेश से सस्ते में आयात कर लेती हैं। इस प्रकार केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा देना और इसी पर फसलों की खरीद अनिवार्य करना किसानों के लिए अहितकारी कदम है।
इसके अलावा पूरे देश में टैक्स के जरिए कुल 16.5 लाख करोड़ रुपये की आय होती है। अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य के जरिए पूरी फसल की खरीद सुनिश्चित की जाती है तो इसमें लगभग 10 लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा जो सरकार के वश में नहीं है। क्योकि ऐसा करने के बाद सरकार के पास अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन नहीं बचेंगे।
सच्चाई यह है कि पश्चिमी देश किसानों को भारी मात्रा में सब्सिडी उपलब्ध कराते हैं, जिसके कारण किसानों की फसल सस्ती बिकती है। लेकिन इसके बाद भी कटु सच्चाई यह है कि पश्चिमी देशों में भी किसानी घाटे का सौदा बनी हुई है। एक सीमा तक उत्पादन बढ़ाकर इस घाटे को पूरा किया जा सकता है। साथ ही घाटे से मुक्ति के लिए किसानों को लाभकारी चीजों की व्यावसायिक खेती की तरफ कदम आगे बढ़ाने होंगे। खेती के साथ-साथ अन्य सह-उत्पादों को भी साथ-साथ आजमाना होगा। केवल किसानी अब उनकी समस्याओं का पूरा निराकरण करने में सक्षम नहीं है और इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया जाना चाहिए।