सीबीआई ने यूपीए सरकार के कार्यकाल में एयर इंडिया को हुए हजारों करोड़ रुपये के नुकसान की जांच शुरू कर दी है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने दो सरकारी एयरलाइंस के लिए 111 विमानों की खरीद, विमानों को लीज पर लेने और एयर इंडिया द्वारा मुनाफे वाले हवाई मार्गों को छोड़ने के फैसले में हुई कथित अनियमितता की जांच के लिए तीन एफआईआर दर्ज की हैं।
70,000 करोड़ रुपये की राशि से 111 विमानों की खरीद का फैसला 2006 में हुआ था। सीबीआई मनमोहन सिंह सरकार के इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया के विवादास्पद विलय की जांच भी करेगी। इसके लिए पीई (प्रारंभिक जांच) दर्ज की गई है।
सीबीआई के प्रवक्ता आरके गौड़ ने कहा कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय और एयर इंडिया के अज्ञात अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई हैं।
यूपीए सरकार के कार्यकाल में इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया के विलय के फैसले से सरकारी खजाने को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा। इसकी जांच के लिए भी पीई दर्ज की गई है।
सीबीआई के सूत्रों के मुताबिक, दो सरकारी एयरलाइनों के विलय के संबंध में सभी हितधारक जांच के घेरे में हैं। सीबीआई की यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के पांच जनवरी 2017 के निर्देश पर हुई है। शीर्ष अदालत ने सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने जनहित याचिका पर यह निर्देश दिया था।
70,000 करोड़ का था सौदा
एफआईआर- 1
पहला मामला सरकारी कंपनियों के लिए 111 विमानों की खरीद से जुड़ा है। यह सौदा 70,000 करोड़ रुपये का था। आरोप है कि इसमें विदेशी कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया। इस खरीद से पहले से दबाव में चल रही सरकारी विमानन कंपनी को भारी वित्तीय घाटा हुआ।
एफआईआर- 2
दूसरा मामला बड़ी संख्या में विमानों को लीज पर लेने का है। आरोप है कि रूट की स्टडी और मार्केटिंग या कीमतों पर विचार किए बिना ही फैसला ले लिया गया। यह भी आरोप है कि विमानों को लीज पर तब लिया गया जब खरीद प्रक्रिया जारी थी।
एफआईआर- 3
तीसरा मामला मुनाफे वाले हवाई मार्गों को छोड़ने का है। आरोप है कि देश और विदेश की निजी विमान कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया। इससे सरकारी कंपनी को काफी वित्तीय नुकसान हुआ।
कैग ने बताया था आपदा का नुस्खा
सीएजी ने वर्ष 2011 में 111 विमानों की खरीद के लिए सरकार के फैसले के तर्क पर सवाल उठाए थे। 2006 के इस फैसले के तहत 70,000 करोड़ रुपये की राशि से एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के लिए 48 एयरबस और 68 बोइंग की खरीद होनी थी।
इस फैसले को ‘आपदा का नुस्खा’ बताते हुए सीएजी ने कहा था कि इससे नागरिक उड्डयन मंत्रालय, सार्वजनिक निवेश बोर्ड और योजना आयोग में खलबली मच जानी चाहिए थी। सीएजी ने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय के फैसले की टाइमिंग पर भी सवाल उठाए थे। अब सीबीआई इस विलय के सभी पहलुओं की जांच करेगी।
प्रफुल्ल पटेल ने शुरू की थी विलय की प्रक्रिया
16 मार्च, 2006 को तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने इंडियन एयरलाइन और एयर इंडिया के विलय की प्रक्रिया शुरू की थी। 22 मार्च, 2006 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने एक प्रजेंटेशन दिया गया।
इसके बाद एक मंत्री समूह ने प्रस्ताव की पड़ताल की। एक मार्च 2007 को मनमोहन सिंह कैबिनेट ने इस विलय को मंजूरी दी। अप्रैल 2007 में इंडियन एयरलाइंस का एयर इंडिया के साथ आधिकारिक विलय हो गया। उस समय इंडियन एयरलाइंस के सीईओ विश्वपति त्रिवेदी थे, जबकि एयर इंडिया के सीएमडी तुलसीदास थे।
50,000 करोड़ का कर्ज है एयर इंडिया पर
एयर इंडिया इस समय 30,000 करोड़ के बेलआउट पैकेज पर चल रही है। यह पैकेज उसे दस साल की अवधि के लिए मिला है। एयरलाइंस वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए दूसरे उपायों पर भी काम कर रही है। कंपनी पर इस समय 50,000 करोड़ रुपये का कर्ज है। इसमें से करीब एक तिहाई कर्ज का कारण विमानों की खरीद है। 19 बैंकों के समूह ने एयर इंडिया को कर्ज दिया है।
अश्विनी लोहानी ने भी विलय के फैसले पर साधा था निशाना
एयर इंडिया के एमडी अश्विनी लोहानी कंपनी की इस हालत के लिए यूपीए सरकार को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। उन्होंने इसी महीने 14 मई को अपने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि एयर इंडिया की खराब माली हालत के लिए पूर्व सरकार के दोनों संगठनों के विलय समेत अन्य गलत निर्णय जिम्मेदार हैं।
इसके साथ कंपनी पर कर्ज इतना अधिक है जिससे पार पाना मुश्किल है। यही सारी समस्याओं का कारण है...। वरिष्ठ प्रबंधन स्तर पर कुप्रबंधन से भी कंपनी की स्थिति बदतर हुई है।