विवादित इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाईक ने अपनी संस्था इस्लामिक रिसर्च सेंटर (आईआरएफ) पर लगाए गए प्रतिबंध पर केंद्र सरकार को कोसा है। उन्होंने शुक्रवार को खुला पत्र जारी कर कहा कि आईआरएफ पर प्रतिबंध सोच-समझकर नोटबंदी के समय पर लगाया गया, जिससे कि किसी का ध्यान इस मुद्दे की ओर न जाए।
उन्होंने कहा कि इस समय देश की जनता नोटबंदी की वजह से नकदी की किल्लत से जूझ रही है। ऐसे में किसी के पास इस मुद्दे पर विरोध करने की न तो शक्ति है और न ही समय। मीडिया में भी इस समय नोटबंदी का मुद्दा ही छाया हुआ है। इस वजह से मीडिया का ध्यान भी इस मुद्दे की ओर नहीं गया। जाकिर ने अपनी संस्था पर लगे प्रतिबंध को मुस्लिमों, शांति, लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था पर हमला बताया है। उन्होंने कहा है कि सरकार ने उनका पक्ष जाने बिना ही उनकी संस्था पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसे में वह सरकार को इसका कानूनी तरीके से जवाब देंगे।
विवादित उपदेशक ने कहा कि उनकी संस्था पर प्रतिबंध लगाए जाने से पहले न तो नोटिस नहीं दिया गया और ना ही समन या कोई कॉल की गई। जाकिर ने कहा कि उन्होंने अपना पक्ष रखा, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। उन्होंने केंद्र सरकार की कार्रवाई को सांप्रदायिक बताया और कहा कि 25 सालों से वह कानून के दायरे में काम कर रहे थे। अचानक उनकी संस्था को प्रतिबंधित कर दिया गया। जाकिर ने तीन पन्ने के अपने बयान में अल कुरान की आयतों को उद्धृत किया है और कहा है कि वह हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ हैं।