कोरोना काल की आर्थिक मंदी का हर क्षेत्र पर सीधा असर पड़ा है। फिक्की के एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि पिछले तीन महीने के दौरान लगभग 12 फीसदी स्टार्ट-एप कंपनियों ने इसी दौरान अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया है। अन्य स्टार्ट-अप्स को भी भारी परेशानी और नकदी की किल्लत से गुजरना पड़ रहा है। इसी दौरान निवेशकों ने भी स्टार्ट-अप कंपनियों में निवेश करने के अपने पुराने फैसलों को होल्ड कर दिया है तो लगभग 10 फीसदी निवेशकों ने अपने निवेश करार रद्द कर दिए हैं।
सर्वे में शामिल 250 स्टार्ट-अप्स कंपनियों में से एक तिहाई ने कहा है कि उनके निवेशकों ने प्रोजेक्ट में निवेश करने का फैसला कुछ समय के लिए टाल दिया है तो 10 फीसदी ने कहा है कि उनके निवेशकों ने उनके प्रोजेक्ट में पैसा डालने से पूरी तरह इनकार कर दिया है। केवल आठ फीसदी कंपनियों ने स्वीकार किया है कि कोविड के पहले हुए निवेश के समझौते के मुताबिक़ उन्हें नकदी उपलब्ध करा दी गई है। सर्वे से प्राप्त परिणामों के अनुसार कोरोना के कारण 70 फीसद स्टार्ट-अप को भारी नुकसान झेलना पड़ा है। 12 फीसदी स्टार्ट-अप्स को बंद करना पड़ा है, जबकि 60 फीसदी चलने वाले स्टार्ट-अप भारी नुकसान के साथ चल रहे हैं।
सर्वे के मुताबिक इसमें केवल 22 फीसदी कंपनियों के पास ही इतना पैसा है कि वे आगे के तीन से छह महीनों के अपने स्थायी खर्च को उठा सकेंगी। यानी अगर इस बीच स्थिति में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बनती है तो इनके भी ठप होने की स्थिति आ सकती है। इस समस्या का हल कंपनियों ने स्टाफ घटाने और उनकी वेतन कटौती के रूप में निकाला है। लगभग एक तिहाई कंपनियों ने कहा है कि अगर व्यापार की संभावनाओं में सुधार नहीं होता है तो वे आगे स्टाफ की कटौती कर सकती हैं।
कई कंपनियों में कर्मचारियों के वेतन में अप्रैल से जून महीने के बीच 20 से 40 फीसदी तक की कटौती हुई है। फिक्की के स्टार्ट-अप कमेटी के चेयरमैन गणेश राजू ने कहा है कि इस सर्वे से यह स्पष्ट हो गया है कि कोरोना काल में आई मंदी ने सबसे ज्यादा स्टार्ट-अप्स को ही नुक्सान पहुंचाया है। इस परिस्थिति में भी आगे चलते रहने के लिए उन्हें फंड का बहुत बेहतर इस्तेमाल करना होगा।