समान अधिकारों की लड़ाई की शुरुआत आम महिलाओं ने शुरू की। प्राचीन ग्रीस की लीसिसट्राटा नामक महिला ने फ्रेंच क्रांति के दौरान युद्ध समाप्त करने के लिए इस आंदोलन की शुरुआत की। इसके बाद फारसी महिलाओं के एक समूह ने वरसेल्स में एक दिन मोर्चा खोला जिसका उद्देश्य युद्ध के दौरान महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकना था।
सन 1908 में 15,000 महिलाओं ने न्यूयॉर्क सिटी में वोटिंग अधिकारों, बेहतर वेतन और काम के घंटे कम करने की मांग को लेकर मार्च निकाला जिसके एक साल बाद अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी ने सन 1909 में 28 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया।
इसे सन 1910 को कोपनहेगन में मनाया गया। सन 1911 को ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में लाखों महिलाओं ने रैली निकाली। मताधिकार, सरकारी कार्यालयों और नौकरी में भेदभाव को खत्म करने जैसे कई मुद्दों की मांग को लेकर इस दिन का आयोजन किया जाता है।
#मीटू ने पूरी दुनिया में ट्रेंड किया जिसकी शुरुआत अभिनेत्री एलाइसा मिलानो ने की। अपने ट्विटर पर अभिनेत्री ने लिखा कि उन्हें अपने एक दोस्त से सुझाव मिला है #मीटू का, जिसके जरिये महिलाएं अपने साथ हुई किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न की कहानी बयां कर सकती हैं।
जिसके बाद हैशटैग मीटू पूरे विश्व सहित भारत में भी ट्रेंड करने लगा। हैशटैग मीटू (#metoo) के जरिए रेडियो और फेसबुक पर महिलाओं ने अपने साथ हुई घटनाओं के बारे में लोगों को बताया। महिलाओं को सहयोग देने के लिए पुरुषों ने भी हैशटैग मीटू का इस्तेमाल किया।
वास्तव में पुरुष दिवस 19 नवंबर को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत सन 1990 में हुई थी। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। इस दिन को सकारात्म पुरुष रोल मॉडल्स की ओर लोगों का ध्यान खींचने, पुरुषों की सेहत और लिंग समानता के लिए मनाया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका
संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्वभर में कुछ नीतियां, कार्यक्रम और मापदण्ड बनाए हैं जिसके जरिये महिलाओं के समानाधिकार को बढ़ावा और महिलाओं को सुरक्षा दी जाती है। इस दिन समाज, राजनीति, संगीत, फिल्म, साहित्य और शिक्षा क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए महिलाओं को सम्मानित किया जाता है। साथ ही कई संस्थाओं द्वारा महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।
जिस दिन विश्व की महिलाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्ण आजादी मिलेगी, जब दहेज के लालच में उन्हें जिंदा नहीं जलाया जाएगा, जब उनके साथ बलात्कार नहीं होगा, जब ना उन्हें बेचा जाएगा और ना ही कन्या भ्रूण हत्या होगी उसी दिन सही मायनों में महिला दिवस सार्थक हो पाएगा।