कोरोना की वजह से दुनिया भर की अर्थव्यवस्था में आई गिरावट का असर अब भी देखा जा रहा है। इस नुकसान के बीच एक ही खबर से लोगों को कुछ राहत मिल रही थी। वह ये कि कोरोना की वजह से पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण बहुत घट गया था। आर्थिक गतिविधियों, औद्योगिक इकाइयों के बंद हो जाने, फैक्ट्रियों में कामकाज रुकने और वाहनों की आवाजाही बंद हो जाने से प्रदूषण के स्तर में खासी कमी दर्ज की गई थी।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने चिंता जताई है कि कोरोना काल में मिली यह बढ़त कमजोर पड़ सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि कोरोना काल में लोगों की गरीबी में बढ़ोतरी हुई है। जिन लोगों की नौकरियां गई हैं, वे पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की तरफ मुड़ सकते हैं। इससे पूरी दुनिया में पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि हो सकती है।
दरअसल, कोरोना महामारी के आने से पहले यह उम्मीद जताई जा रही थी कि भारत में आर्थिक गतिविधियों के तेजी से बढ़ने के कारण 2019 की तुलना में 2030 तक ऊर्जा में 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। भारत सरकार लगातार सोलर ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है और देश की कुल ऊर्जा खपत में इसकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ती जा रही है। इसका नतीजा ये हुआ है कि भारत विश्व पर्यावरण के प्रति जताई अपनी चिंता से ज्यादा बेहतर ढंग से निर्वाह कर रहा था। पूरे विश्व में इसकी सराहना हुई थी।
लेकिन आशंका है कि कोरोना काल के कारण आई मंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट आ सकती है। इसके कारण लोगों की नौकरियों पर संकट बरकरार रह सकता है। कोरोना काल में देश में बेरोजगारी दर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी। नौकरी गंवाने वालों में गरीब, श्रमिक वर्ग के लोग ज्यादा थे। रोजगार दर में रिकवरी भी अपेक्षित स्तर पर नहीं हुई है।
इस नुकसान को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने चिंता जताई है कि निम्न तबके के लोग नौकरियों पर आए संकट के कारण घरेलू ऊर्जा के लिए पारंपरिक स्रोतों की तरफ रुख कर सकते हैं। भारत जैसे देश में लोग ऊर्जा जरूरतों के लिए गैस के उपयोग की बजाय लकड़ी, उपले की तरफ रुख कर सकते हैं। इससे विश्व पर्यावरण को नुकसान हो सकता है।
ऊर्जा मामलों के जानकार टेरी के सीनियर फेलो पूर्व सचिव अजय शंकर ने अमर उजाला से कहा कि इस तरह के संकट से निपटने के लिए सरकार को इस वर्ग तक गैस सब्सिडी बढ़ाने की तरफ विचार करना चाहिए। भारत ने तेजी से अपनी स्वच्छ ईंधन की क्षमता में बढ़ोतरी की है। इस बढ़त को किसी भी तरह से बचाया जाना चाहिए। इसके लिए गैस के दामों पर नियंत्रण रखना भी जरूरी है।
इसके अलावा लोगों को सोलर ऊर्जा के गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ाने पर विचार किया जाना चाहिए। भारत अपनी कुल ऊर्जा खपत का लगभग 10 फीसदी तक सोलर ऊर्जा के माध्यम से प्राप्त कर रहा है। लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि जर्मनी में सौ फीसदी तो इंग्लैंड में लगभग 35 फीसदी ऊर्जा जरूरतें सोलर माध्यम से प्राप्त की जा रही हैं। अगर देश इस दिशा में काम कर सके तो इससे न सिर्फ कार्बन न्यूट्रिलिटी के लक्ष्य तक पहुंचने में मदद मिलेगी, बल्कि देश के पेट्रोलियम आयात बिल को कम कर देश की बहुमूल्य ऊर्जा को बचाया जा सकता है।