आतंकी सूचनाएं एवं दूसरी बड़ी संभावित घटनाओं से जुड़ी जानकारी के आदान-प्रदान को लेकर देश के सबसे बड़े खुफिया तंत्र 'आईबी' के 'मल्टी एजेंसी सेंटर' (मैक) में जुबान खोलना आसान नहीं होता। इस केंद्र पर दो दर्जन से अधिक केंद्रीय जांच एवं सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारी नियमित बैठक करते हैं। जिन एजेंसियों के पास जो इनपुट होता है, उसे मैक में साझा किया जाता है। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, कई बार मैक में 'जुबान' खोलना आसान नहीं होता। सूचना होती है, मगर उसे साझा करने से गुरेज किया जाता है। वजह, सूचना थोड़ी बहुत अपुष्ट रहती है या फिर उस बाबत सवालों की बौछार संबंधित अधिकारी को चुप रहने के लिए मजबूर कर देती है। कई बार ऐसा भी होता है कि एक ही विषय पर कई एजेंसियों की तरफ से सूचना आती है। तब माहौल गर्मा जाता है कि किसकी सूचना को 'प्रथम' माना जाए। अपनी सूचना को 'टॉप' पर रखने के लिए एजेंसियों के बीच में प्रतिस्पर्धा का माहौल बन जाता है। खासतौर से जम्मू कश्मीर, मणिपुर सहित नॉर्थ ईस्ट के दूसरे सीमावर्ती इलाके, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश बॉर्डर, ड्रग्स और समुद्री क्षेत्रों से जुड़ी खुफिया सूचनाओं पर खूब माथापच्ची होती है। यहां तक कि 'सूचना' का स्त्रोत भी पूछा जाता है।
मैक में खुफिया अलर्ट या दूसरी तरह की संजीदा जानकारी रखने वाले अधिकारी कई बार 'हंसे तो फंसे' के खेल में घिर जाते हैं। अगर किसी एजेंसी के अफसर के पास ज्यादा पुख्ता जानकारी नहीं है या उस बाबत पर्याप्त तथ्य पेश करने में वह असफल रहता है तो उस पर इतने सवालों की बौछार होती है कि वह खुद को हंसी का पात्र समझने लगता है। नतीजा, कई बार कम पुख्ता या छोटी सूचनाओं को मैक में बताने से संबंधित अधिकारी गुरेज करने लगता है। इसमें किसी बड़ी वारदात का अलर्ट दबने की संभावना बनी रहती है। कोई अहम सूचना जो सुरक्षा बलों या जांच एजेंसियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है, समय रहते उस पर काम नहीं हो पाता। बाद में उसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
यह भी होता है कि एक एजेंसी, दूसरी एजेंसी द्वारा दिए गए इनपुट को गिराने का प्रयास करती है। मणिपुर और उत्तर पूर्व के राज्यों से जुड़े इनपुट पर कई एजेंसियां आपस में भिड़ जाती हैं। बैठक में इनपुट की गहराई एवं ठोस स्त्रोत का राज खोलने के लिए कहा जाता है। बता दें कि 26/11 के मुंबई हमले के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार ने अमेरिकी खुफिया तंत्र की तर्ज पर मैक का गठन किया था। मैक में एनआईए, सीबीआई, रॉ, डीआरआई, ईडी, सभी अर्धसैनिक बल, आरपीएफ और तीनों सेनाओं की खुफिया विंग सहित लगभग दो दर्जन से अधिक एजेंसियां आतंकी एवं दूसरी अहम सूचनाएं सांझा करने के लिए दिल्ली में नियमित बैठक करती हैं।
सूत्र बताते हैं कि मैक में जब किसी एजेंसी द्वारा कोई सूचना साझा की जाती है तो संबंधित अफसर पर न केवल सवालों की झड़ी लगती है, बल्कि सूत्र का नाम, पता और फोन नंबर तक देने का दबाव डाला जाता है। इस वजह से सूचना लाने वाली एजेंसी भी पशोपश में पड़ जाती है। खुद अफसर भी 'हंसी और फंसी' के चक्कर में फंसते देखे गए हैं। मतलब, जब दर्जनों सवाल दागे जाते हैं तो वह अफसर खुद को हंसी का पात्र समझता है। यदि वह सूचना सांझा नहीं करता और बाद में कोई बड़ी घटना होती है तो उसका फंसना तय होता है।
खुफिया इकाई के मल्टी एजेंसी सेंटर में दागे जाने वाले दर्जनों सवालों के भय से कई बार जरूरी सूचनाएं बीच राह में ही अटक जाती हैं। अगर कोई सूचना पहुंचती है तो उसमें ठोस सबूत नहीं होते। दूसरी तरफ आतंकी और नक्सली हमले की ज्यादातर सूचनाएं देने वाले अर्धसैनिक बल, सर्विलांस के अभाव में भारी जान-माल का नुकसान उठाते हैं। रिटायर्ड आईपीएस शंकर सेन ने मैक को लेकर एक बार कहा था कि मैक में बेहतर समन्वय की काफी गुंजाइश है। एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाना होगा। इसके लिए मैक में कई तरह के सुधार करने बहुत जरूरी हैं। सूत्र बताते हैं कि हाल ही के वर्षों में कई सुधार किए गए हैं।
पुलिस सुधार विशेषज्ञ के तौर पर अपनी बात रखने वाले एक पूर्व आईपीएस कहते हैं, आतंकी हमलों से निपटने के लिए संसाधन मिलना तो ठीक है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है ठोस खुफिया जानकारी हासिल होना। फिलहाल खुफिया महकमा यह बताता है कि एक-दो माह में कहीं हमला हो सकता है। इस सूचना का कोई औचित्य नहीं होता। विस्फोट कर आतंकी फरार हो जाता है और पुलिस लकीर पीटती रहती है। इंटेलीजेंस विभाग में बेहतर ट्रेनिंग का प्रावधान हो।
पुलिस आम लोगों को अपने साथ लेकर काम करें और उन्हें अवार्ड भी दे।मैक में सुधार करना होगा। विभिन्न एजेंसियों के साथ तालमेल कर बेहतर अलर्ट हासिल किए जा सकते हैं। अगर छोटी बड़ी सभी खुफिया सूचनाओं का सूक्ष्म तरीके से अध्ययन किया जाए तो बहुत से आतंकी हमलों को होने से पहले ही रोका जा सकता है। इसके लिए सभी एजेंसियों की खुफिया विंग को एक छत के नीचे प्रशिक्षण देकर उन्हें 'रियल टाइम अलर्ट' और हमले को होने से पहले ही रोक देना, यह जानकारी देनी चाहिए। सीआरपीएफ के पूर्व डीजी के. विजय कुमार और बीएसएफ के पूर्व डीजी रमन श्रीवास्तव सहित कई महानिदेशकों ने मैक को मजबूती प्रदान करने के लिए अर्धसैनिक बलों को सर्विलांस की सुविधा देने का प्रस्ताव केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजा था।
कई वर्ष पहले आसूचना ब्यूरो के निदेशक द्वारा संसदीय समिति को बताया गया था कि कुछ राज्य ऐसे हैं जो मल्टी एजेंसी सेंटर से गोपनीय सूचना साझा करने में कतराते हैं। राज्यसभा की संसदीय समिति में यह भी कहा गया कि ज्यादातर राज्य, सूचनाओं के आदान प्रदान में सहयोग करते हैं।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने गत वर्ष जुलाई में विभिन्न सुरक्षा और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के प्रमुखों के साथ देश की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए उत्तरदायी आसूचना ब्यूरो के मल्टी एजेंसी सेंटर की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की थी। शाह ने देशभर की खुफिया और प्रवर्तन एजेंसियों सहित विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुखों को राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति 'संपूर्ण सरकार' दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश दिया। देश में उभरते सुरक्षा खतरे के परिदृश्य से निपटने के लिए आतंकी नेटवर्क और उनके सहायक इको-सिस्टम को खत्म करने के लिए सभी एजेंसियों के बीच अधिक तालमेल पर जोर दिया।
केन्द्रीय गृह मंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा में शामिल सभी एजेंसियों से युवा, तकनीकी रूप से कुशल जोशीले अधिकारियों की एक टीम गठित करने पर जोर दिया था। इसका मकसद बिग डेटा और एआई/एमएल संचालित एनालिटिक्स एवं तकनीकी प्रगति का उपयोग कर आतंकी इकोसिस्टम को खत्म करना था। उन्होंने दोहराया कि नई और उभरती सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर हमें अपने रिस्पॉन्स में हमेशा एक कदम आगे रहना होगा। केन्द्रीय गृह मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, मैक फ्रेमवर्क अपनी पहुंच और प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए बड़े तकनीकी व ऑपरेशनल सुधारों को लागू करने को तैयार है। उन्होंने सभी स्टेकहोल्डर्स से त्वरित प्रतिक्रियाओं और साझा की गई जानकारियों के एग्रेसिव फॉलोअप के माध्यम से इन प्रयासों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया था।