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सहारनपुर: जातीय हिंसा के जख्मों से नफरत की चिंगारी में धधक रहे कई गांव

Thu, 25 May 2017 06:20 AM IST
शशांक मिश्र/ अमर उजाला, सहारनपुर
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मल्हीपुर रोड पर चंदपुर गांव में चंद कदमों की दूरियां नाप लेने के बाद यह महसूस होता है कि यहां जो सन्नाटा है वह चिलचिलाती दोपहरी का नहीं, बल्कि भीतर धधक रही नफरत की आग की वजह से है।
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ऊपर से शांत दिख रहे चंदपुर, शब्बीपुर और बड़गांव तक भीतर नफरत की चिंगारी सुलग रही है। चंदपुर गांव की सड़क पर 72 साल के साधुराम के चेहरे पर चिंता की लकीरें हैं। इससे पहले उन्होंने लोगों को आपस में लड़ते-कटते नहीं देखा। अमूमन इस इलाके में खेतों में फसलें लहलहाती थीं, गन्ने की मिठास होती थी। मगर, अब यहां का मंजर रक्तरंजित हो चुका है। 

लोग एक अज्ञात भय से डरे हुए हैं। साधुराम कहते हैं कि हमारे जमाने में ऊंच-नीच की कोई बात नहीं थी। नई पीढ़ी को न जाने किसकी नजर लग गई है। बिना बात के ही लोग झगड़े और मार-काट पर उतारू हैं।
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करीब चार किमी दूर शब्बीरपुर में हालात ज्यादा भयावह हैं। गांव में रविदास मंदिर से ही दलित बस्ती शुरू होती है, यहां के लोग अफसरों के सामने अपना गुस्सा निकाल रहे हैं। मगर, सटीक जवाब नहीं मिलने से उनका गुस्सा दूसरे पक्ष पर भड़क रहा है।

कुछ ऐसा ही हाल राजपूत टोले का भी है। वहां महिलाएं दूसरी जाति के लोगों पर संगीन आरोप लगाती हैं और प्रशासन पर दबाव में कार्रवाई की बात भी कह रही हैं। कुल मिलाकर यहां सौहार्द का ताना बाना छिन्न भिन्न हो चुका है और जातीय हिंसा के जख्मों से पूरा क्षेत्र ही बड़ी मुश्किल में है।

गांव के बाहर हमला कर सबको बदनाम कर दिया

मंगलवार को बसपा सुप्रीमो की सभा से लौट रहे लोगों पर अचानक हुए हमले से चंदपुर के लोग भी दुखी हैं। नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं कि जिन लोगों ने ऐसा किया है वे किसी जाति के नहीं बल्कि पूरे समाज के दुश्मन हैं।

अगर हमें उनके मंसूूबों की भनक भी होती तो पहले पुलिस को खबर कर देते। गांव के बाहर हमला कर हम सबको बदनाम कर दिया है। यहां भी विश्वास को तोड़ने की कोशिश की गई। 

पुलिस वाले तैनात हैं, मगर वे हमारी सुनते ही नहीं
शब्बीरपुर गांव में घुसते ही दलित महिला कमला का मकान है। उसकी दीवारें टूटी हैं। घर का सामान बिखरा पड़ा है। उनका कहना है कि पांच मई को उन पर भी हमला हुआ और घर तोड़ दिया गया।

अधिकारी उनकी तरफ हैं और यही कारण है कि उन्हें अब तक कोई मदद नहीं मिल पाई। राजपूत समाज की कंचन कहती हैं कि हमारे घरों के बेकसूर युवकों को जेल में डाल दिया गया है। महिलाएं घरों में अकेली हैं और गाहे-बगाहे आपत्तिजनक और अपमानित करने वाली टिप्पणियां भी की जाती हैं। पुलिस वाले तैनात हैं, मगर वे हमारी सुनते ही नहीं। 

दोनों ही टोलों के युवाओं के खून अब भी उबाल मार रहे

दोनों ही टोलों के युवाओं के खून अब भी उबाल मार रहे हैं। मीडिया के खिलाफ भी उनका गुस्सा है और कहते हैं कि हमें किसी की जरूरत नहीं है। अपनी लड़ाई हम लड़ना जानते हैं। हालांकि बुधवार को प्रमुख सचिव गृह ने शब्बीरपुर गांव का दौरा कर दोनों पक्षों के लोगों से मुलाकात की तो उनका गुस्सा थोड़ा शांत होता नजर आया। शब्बीरपुर में दलित और राजपूत टोले बिल्कुल सटे हुए हैं। दोनों बस्तियों के बीच में भारी पुलिस फोर्स तैनात है। 

जयंतियों को लेकर शुरू हुआ था बवाल
जिला मुख्यालय से करीब 25 किमी दूर शब्बीरपुर गांव में करीब पांच महीने पहले संत रविदास मंदिर में अंबेडकर की प्रतिमा लगाने का कार्यक्रम था। उस वक्त राजपूतों के विरोध के चलते पुलिस ने इस प्रतिमा को नहीं लगाने दिया। इसके बाद अंबेडकर जयंती पर गांव में जूलुस निकालने की अनुमति भी नहीं मिली।

इसी तरह पांच मई को शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती के कार्यक्रम को अनुमति मिलने से दलित समाज भड़क गया। कुछ लोगों ने इसे मुद्दा बनाया और इस सड़क से उस जयंती में शामिल होने वालों के विरोध पर उतर गए।

जब राजपूत समाज के युवा समूह में गली तक पहुंचे तो उन पर पथराव कर दिया गया। इसके बाद वहां बड़ी संख्या में लोग जुट गए और जमकर बवाल हुआ। कई दलित परिवारों के घर जला दिए गए।

इसी तरह नौ मई को भीम आर्मी के प्रदर्शन को बलपूर्वक रोका गया तो जिले में करीब नौ जगहों पर जबरदस्त बवाल हुआ। अब 23 मई को मायावती के शब्बीरपुर दौरे और सभा से लौट रहे लोगों पर हमले ने इस आग को हवा दे दी है।
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कार्रवाई पर दोनों पक्षों को आश्वस्त नहीं कर पाया प्रशासन

इस पूरे बवाल के पीछे पुलिस और प्रशासन की एक बड़ी चूक जो सामने आ रही है वह अब तक हुई कार्रवाई पर दोनों पक्षों को आश्वस्त नहीं कर पाना है। यही कारण है कि दलित पक्ष अफसरों के अपरकास्ट का होने पर सवाल उठाकर राजपूतों को शह देने का आरोप लगाता रहा। वहीं राजपूत दलितों के दबाव में कार्रवाई होने की बात करते रहे।

सोशल मीडिया भी बवाल का बड़ा कारण
सहारनपुर में फैल रही जातीय हिंसा भड़कने के पीछे बड़ा कारण सोशल मीडिया भी है। युवाओं और गांव के अन्य लोगों के ग्रुप बने हैं और छोटी-छोटी सूचनाएं चंद सेकेंड में प्रसारित हो रही हैं। यही कारण है कि गांव का माहौल शांत होने पर भी अफवाहों का दौर जारी रहता है। वहां तैनात पुलिसकर्मियों का कहना है कि कई बार गांव शांत रहता है मगर लोग एकाएक उत्तेजित से हो जाते हैं।

'' गांव में अमन चैन कायम करने के लिए पूरी कोशिश जारी है। मुख्यमंत्री ने कानून के राज की बात की है और हम उसी के अनुपालन में गांव में पहुंचे हैं। गांव में संवादहीनता के कारण विश्वास का संकट है, मगर उसे हर हाल में दूर किया जा रहा है। ''
-मणि शंकर मिश्र, प्रमुख सचिव गृह
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