विमानवाहक पोत 'आईएनएस विक्रांत' के श्रेय को लेकर कांग्रेस पार्टी ने सवाल उठाए हैं। वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा, ये पोत केवल मोदी सरकार की उपलब्धि नहीं है। देश में 1999 के बाद जितनी भी सरकारें आई हैं, उन सभी का इस उपलब्धि में योगदान है। यह सभी सरकारों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफल है। कांग्रेस नेता ने अपने ट्वीट के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किया है, क्या वे इस बात को स्वीकार करेंगे कि ये सभी की कोशिशों से संभव हो सका है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत 'आईएनएस विक्रांत', राष्ट्र को समर्पित करते हुए कहा, ये पोत केवल एक युद्ध मशीन नहीं, बल्कि भारत के कौशल और प्रतिभा का प्रमाण भी है। आईएनएस विक्रांत, भारत के रक्षा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अपने ट्वीट में '1971' की याद दिलाई है। उन्होंने कहा, आइए मूल आईएनएस विक्रांत को भी याद करें, जिसने 1971 के युद्ध में हमारी अच्छी सेवा की थी। देश के रक्षा मंत्री रहे वीके कृष्ण मेनन ने इसे ब्रिटेन से प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मेनन को आजादी मिलने के बाद यूके में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था। 1953 में कृष्ण मेनन, राज्यसभा के सदस्य बने थे। 1956 में वीके कृष्ण मेनन को केंद्रीय मंत्रिमंडल में बिना विभाग के मंत्री के रूप में शामिल किया गया। कुछ समय बाद मेनन को रक्षा मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया।
उन्होंने यूएन सुरक्षा परिषद में कश्मीर को लेकर आठ घंटे लंबा भाषण दिया था। जयराम रमेश ने 'अ चेकर्ड ब्रिलियंस द मैनी लाइव्स ऑफ वीके कृष्ण मेनन' किताब लिखी है। रमेश के मुताबिक, 1952 से लेकर 1957 तक कृष्ण मेनन को 'फॉर्मूला मेनन' कहा जाता था। भारत में हथियार बनाने के कारखाने हों या विमानवाहक पोत, यह सब मेनन की वजह से संभव हुआ था। स्वदेशी टैंक और हथियारों के निर्माण में भी मेनन की नीति कारगर साबित हुई थी।
पीएम मोदी ने कहा, आईएनएस विक्रांत का सेवा में आना, रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके चलते भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस जैसे उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है, जिनके पास स्वदेशी रूप से डिजाइन करने और एक विमानवाहक बनाने की क्षमता है। यह भारत सरकार की 'मेक इन इंडिया' पहल का एक वास्तविक प्रमाण है। नौसेना के लिए यह एक एतिहासिक पल है, क्योंकि 25 वर्ष बाद विक्रांत एक बार फिर नए रूप में और नई ताकत के साथ नौसेना की शान बना है। प्रधानमंत्री ने कहा, लक्ष्य कितना भी कठिन क्यों न हो, चुनौतियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, जब भारत ठान लेता है तो कोई भी लक्ष्य हासिल करना असंभव नहीं होता।