युवाओं की असामयिक मौत की सबसे बड़ी वजह सड़क पर चोट लगना है। 2017 में सड़क पर चोट लगने से 2.2 लाख की मौत हुई। लैंसेट पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में इसका खुलासा हुआ है। सड़क हादसे में मारे गए अधिकतर लोग पैदल चलने वाले और मोटरसाइकिल सवार थे। देश में मौत का आंकड़ा दुनियाभर की औसत मौतों से अधिक है।
शोध में पता चला है कि सड़क हादसे में चोट के चलते सबसे अधिक मौत 15 से 39 की उम्र के पुरुषों की हुई। इसके बाद पुरुष और महिलाओं की मौत की दूसरी सबसे बड़ी वजह है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि पैदल चलने वाले, मोटरसाईकिल और साईकिल सवारों की सुरक्षा को लेकर प्रमुखता से काम करना होगा जिससे युवाओं को असामायिक मौत से बचाया जा सके।
मौतों के आंकड़े में कमी की जरूरत
रिपोर्ट के अनुसार 1990 के बाद भारत में सड़क पर चोट लगने से मौतों के आंकड़े में कमी आई है लेकिन इसमें बड़े स्तर पर कमी लाने की जरूरत है तभी संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। 2017 की तरह ही सड़क हादसे में मरने वालों की संख्या आने वाले समय में भी जारी रही, तो देश का कोई भी राज्य सतत विकास लक्ष्य के तय मानकों के अनुसार 2015 से 2020 तक सड़क हादसे में होने वाली मौतों को आधा नहीं कर सकता है। यहां तक की वर्ष 2030 तक।
शहरीकरण चोट की एक बड़ी वजह
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की प्रो. और शोधकर्ता राखी डनडोना का कहना हैकि तेजी से हो रहे शहरीकरण और आर्थिक सुधार के चलते सड़क पर गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है। इसकी तुलना में यातायात कानून और दूसरी सुविधाओं का विस्तार नहीं हो रहा है जिसके चलते सड़क पर चोट लगने से मौतों का आंकड़ा समय दर समय बढ़ रहा है।
तीन स्तर पर सुधार की जरूरत
सड़क पर किसी को चोट न लगे इसके लिए तीन स्तर पर सुधार की जरूरत है। इसमें सबसे पहले हादसा न हो, हादसा हो तो चोट न लगे और चोट लगे तो समय पर इलाज मिले जिससे मौत या अपंगता को रोका जा सके।
खुद भी बरतनी होगी सावधानी
आईसीएमआर के महानिदेशक प्रो. बलराम भार्गव ने कहा, देश में सड़क पर चोट लगने से मौतों का आंकड़ा बहुत अधिक है। इसे कम करने के लिए हर स्तर पर प्रयास की जरूरत है। सड़क पर चलते वक्त लोगों को खुद भी सावधानी बरतनी होगी।