एक पखवाड़े पहले ही इमरजेंसी के लक्षण प्रकट होने लगे थे। शुरूआत हुई, 12 जून, 1975 से। वह इंदिरा गांधी के लिए गहरी उदासी का दिन था। उनके लिए तीन दुखद घटनाएं हुई। डीपी धर का देहांत, इलाहाबाद हाईकोर्ट का खिलाफ फैसला और गुजरात विधानसभा में कांग्रेस की पराजय। इन घटनाओं का क्रम भी उसी तरह है जिस तरह यहां उल्लेख किया गया है। उस दिन के बाद से जो प्रायोजित प्रदर्शन इंदिरा गांधी के समर्थन में हो रहे थे वे यह जानने के लिए साफ संकेत थे कि प्रधानमंत्री का इरादा क्या है।
चंडीगढ़ की जेल में जेपी ने अपनी और विपक्ष की असावधानी को स्वीकार भी किया। उन्होंने माना कि ‘मैं सोच नहीं सका कि इंदिरा गांधी इस हद तक जा सकती हैं। अगर वे इमरजेंसी लगाने की सोचेंगी और लोकतंत्र की हत्या करेंगी तो मैं समझता था कि कांग्रेस वैसा होने नहीं देगी।’ इस कबूलनामे में यथार्थ को झुठलाया गया है।
उसकी अनदेखी की गई। यह सही है कि जवाहर लाल नेहरू की बेटी से जेपी को इसकी आशंका नहीं रही होगी। लेकिन यथार्थ तो कुछ और था। कई सालों से कांग्रेस इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी की घरेलू पार्टी हो गई थी। उसमें लोकतंत्र कहां बचा था? जहां असहमति की कोई गुंजाइश न हो वहां इमरजेंसी स्वाभाविक परिणति थी। विपक्ष से उम्मीद थी कि वह इसे सबसे पहले समझेगा।
वह असावधान रहा। तभी तो विपक्ष के सारे नेता औचक पकड़े गए। अगर वे सावधान होते तो देश को आगाह करते। जरूरत पड़ने पर संघर्ष के लिए एक संदेश छोड़ जाते। जैसा 8 अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी कर गए थे। तब लोगों ने अपने विवेक से स्वतंत्रता संग्राम की आखिरी लड़ाई को अंजाम दिया।
1975 में स्वाधीनता संग्राम से निकले लोकतंत्र को जब इंदिरा गांधी ने नष्ट कर दिया तब सन्नाटा छा गया। पूरे देश को गहरा सदमा लगा। उससे उबरने में छ: माह लग गए। तब कहीं जाकर लोकतंत्र की वापसी का संघर्ष प्रारंभ हुआ। लेकिन उस संघर्ष के परिणाम स्वरूप इमरजेंसी नहीं हटी। वह तो हटी इसलिए कि इंदिरा गांधी को भरोसा हो गया था कि उनकी तानाशाही पर लोकतंत्र की मुहर लोग लगा देंगे। इसलिए चुनाव करवाया, जो उनकी पराजय का कारण बना। लोकतंत्र लौट आया।