देश में प्रतिवर्ष 19 मिलियन टन से अधिक स्टील स्लैग उत्पन्न होता है। बिना प्रोसेस किए स्लैग का उपयोग इस पर आधारित निर्माण सामग्री की यांत्रिक गुणवत्ता और दीर्घकालिक स्थिरता को खतरे में डालता है। एएम/एनएस इंडिया ने काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च और सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ साझेदारी की है। यह कंपनी सड़क निर्माण में प्राकृतिक स्रोतों के स्थान पर प्रोसेस्ड स्टील स्लैग एग्रीगेट्स के उपयोग की तकनीक पर जोर देती है। यह देश की पहली ऐसी कंपनी बनी है, जिसे सीएसआईआर व सीआरआरआई द्वारा स्टील स्लैग वैल्यूराइजेशन टेक्नोलॉजी का लाइसेंस प्राप्त हुआ है। यह संस्था, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन कार्यरत एक राष्ट्रीय स्तर की अग्रणी संस्था है। सतीश पांडे ने बताया कि इस लाइसेंस के साथ एएम/एनएस इंडिया, जिसने हजीरा में भारत की पहली 'ऑल स्टील स्लैग रोड' के निर्माण में हमारा सहयोग लिया था, अब विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए स्लैग का उत्पादन, विपणन अथवा विक्रय सड़क निर्माण के लिए कर सकती है।
एएम/एनएस इंडिया के वरिष्ठ पदाधिकारी, रंजन धर के अनुसार, यह तकनीक सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में 'वेस्ट-टू-वेल्थ' की संभावनाओं का सफलतापूर्वक अनलॉक होगा। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत देश की अग्रणी वैज्ञानिक संस्था से प्राप्त यह लाइसेंस, सर्कुलर इकॉनॉमी और भारत के नेट-ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में कंपनी के नेतृत्व को और अधिक मजबूती प्रदान करता है। व्यापक उपयोग के साथ यह तकनीक प्राकृतिक एग्रीगेट्स को प्रतिस्थापित करने की क्षमता रखती है, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव कम होगा और प्राकृतिक संसाधनों पर बोझ भी घटेगा।
भारत के स्टील उत्पादकों द्वारा वित्त वर्ष 2030-31 तक स्टील उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 300 मिलियन टन तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके चलते वित्त वर्ष 2030 तक स्टील स्लैग उत्पादन की मात्रा 60 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है। स्टील मंत्रालय, इस तकनीक को अपनाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के साथ सहयोग कर रहा है।