रेलवे अधिकारियों का कहना है कि, ये नई रेल लाइन बहुत ही अहम हैं। क्योंकि पिथौरागढ़ जिला नेपाल व चीन के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़ा है। जबकि टनकपुर भारत-नेपाल सीमा से लगता इलाका है। यह स्टेशन उत्तराखंड में नेपाल सीमा पर भारत का आखिरी रेलवे स्टेशन भी है। रेलवे ने इस रूट पर सर्वे के साथ पिलर लगाने का काम भी शुरू कर दिया है।
रेलवे सूत्रों का कहना है कि पिथौरागढ़ जिले के उच्च हिमालय वाले इलाकों में चीन तक पहुंचने के लिए 5 दर्रे हैं। इनमें लम्पिया धुरा, लेविधुरा, लिपुलेख, ऊंटा जयंती व दारमा दर्रे शामिल हैं। ये भी करीब 5 हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित हैं। इसी कारण से सेना के लिए इन क्षेत्रों तक तेजी से पहुंचना और सप्लाई पहुंचना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। अगर टनकपुर से पिथौरागढ़ होते हुए चीन बॉर्डर तक जाएं तो सड़क रास्ते से 16 घंटे से ज्यादा समय लग जाता है। लेकिन इस नई रेल लाइन बिछने के बाद यह काम दो से तीन घंटे में हो जाएगा।
दरअसल, इस क्षेत्र का वर्षों से सामरिक और व्यापारिक महत्व भी रहा है। क्योंकि इन सीमांत जिलों के लोग तिब्बत के साथ सीमा व्यापार करते रहे हैं। इसलिए अंग्रेजों ने भी 1882 में पहली बार टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का सर्वे किया था। उनके सर्वे प्लान के रूट मैप पर ही नए सिरे से सर्वे किया गया है।
नोएडा की स्काई लार्क इंजीनियरिंग डिजाइनिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को रेलवे की ओर से सर्वे का कार्य सौंपा गया है। इसमें प्रारंभिक सर्वे में 169.99 किमी लंबी लाइन की अनुमानित लागत करीब 44140 करोड़ रुपये है। इसके लिए कुल 452 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया है। इसमें निजी जमीन 27 हेक्टेयर है।
ये रेल लाइन 65 टनलों से होकर गुजरेगी। सबसे बड़ी टनल पूर्णागिरि के पास करीब छह किमी लंबी होगी जिसमें कुल 135 पुल बनेंगे। इनमें पांच बड़े पुल होंगे। बताया कि कंपनी की ओर से कई चरणों में सर्वे के तहत पहाड़ की टेस्टिंग, लेबल टेस्टिंग, रडार और ड्रोन से सर्वे के बाद अब पिलर लगाने का कार्य किया जा रहा है। लाइन के लिए 40 मीटर चौड़ाई में जगह चिह्नित की जा रही है। बता दें क 18 अप्रैल से टनकपुर से सर्वे का कार्य शुरू किया गया है।