अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चा तेल महंगा होने से भारत में भी कच्चा तेल महंगा हो जाता है। इससे तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ता है कि वे भी महंगा कच्चा तेल खरीदने पर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाएं। ऐसे में पेट्रोल और डीजल महंगा होने से परिवहन खर्च बढ़ जाता है, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं की महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है।
मध्यपूर्व में काम कर रहे भारतीयों पर असर
इस इलाके में किसी तनाव या जंग का असर मध्य पूर्व के देशों में काम कर रहे लगभग 80 लाख भारतीयों पर भी पड़ेगा। सिर्फ 30 लाख भारतीय तो सऊदी अरब में ही रहते हैं। इससे पहले भी यहां पैदा हुए तनावों के दौरान बड़ी संख्या में भारतीयों को वतन वापस लौटना पड़ा था।
मध्य पूर्व के देशों में काम करने वाले भारतीय हर साल 40 से 70 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा भेजते हैं। तनाव की स्थिति में जब भारतीय अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर से गुजर रही है तो इस आय से वंचित होना भारत के लिए भारी पड़ सकता है।
चाबहार प्रोजेक्ट भी हो सकता है प्रभावित
तनाव का असर भारत और ईरान के चाबहार प्रोजेक्ट पर भी पड़ेगा। अफगानिस्तान में भारतीय आपूर्ति पहुंचाने के लिहाज से चाबहार परियोजना बेहद अहम है। पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के बाजारों तक भारतीय पहुंच के लिए भी यह काफी अहम प्रोजेक्ट है। अगर ईरान-अमेरिका जंग हुई तो यह प्रोजेक्ट फिलहाल बिल्कुल खटाई में पड़ जाएगा।
भारतीय विमान कंपनियां अब ईरानी हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल से बचने के लिए अपनी उड़ानों का रास्ता बदल सकती हैं। इसके पहले भी जून 2019 में भारत के डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीएस) ने ईरान के ऊपर से उड़ान न भरने का फरमान जारी किया था। इसका सीधा असर हवाई किराये पर पड़ेगा।
चालू खाता घाटा में बढ़ोतरी
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से देश का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ने से भारत का आयात बिल उसी अनुपात में महंगा होगा, जिससे चालू खाता घाटा की स्थिति बिगड़ेगी। देश की अर्थव्यवस्था पर उल्टा असर पड़ने से आम आदमी भी प्रभावित होता है।
भारत 80 फीसदी से ज्यादा कच्चे तेल के आयात के लिए दुनिया के दूसरे देशों पर निर्भर है। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ कमर्शियल इंटेलिजेंस एंड स्टेटिस्टिक्स के आंकड़ों के मुताबिक, भारत इराक से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदता है। भारत अरसे से सऊदी अरब से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदता रहा है, मगर वित्त वर्ष 2017-18 में स्थिति बदल गई। इराक इस मामले में पहले नंबर पर आ गया। तब से सऊदी अरब दूसरे नंबर पर रहा है। इसने भारत को इस साल अप्रैल से अगस्त के दौरान 1.77 करोड़ टन कच्चे तेल का निर्यात किया।
एक साल पहले की इसी अवधि में यह मात्रा 1.56 करोड़ टन थी। हालांकि, अमेरिका से भारत के कच्चे तेल की खरीदारी लगातार बढ़ रही है। भारत ने अब ईरान से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया है। ईरान की जगह नाइजीरिया ने ले ली है। वह भारत को कच्चा तेल बेचने के मामले में तीसरे नंबर पर है। नाइजीरिया ने 2019 में अप्रैल से अगस्त के दौरान भारत को 71.7 लाख टन कच्चे तेल की आपूर्ति की। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात और वेनेजुएला का नंबर है।
वेनेजुएला ने 61 लाख टन कच्चा तेल भारत को बेचा। वहीं, कुवैत ने भारत को 42 लाख टन और मैक्सिको ने 33 लाख टन कच्चा तेल बेचा। अमेरिका ने भारत को 2017 में कच्चा तेल बेचना शुरू किया था। 2019 के मई में अमेरिका के ईरान पर प्रतिबंध लगा देने के बाद से भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। इससे ईरान से भारत का आयात घटकर सिर्फ 20 लाख टन रह गया। 2018 की इसी अवधि में यह 1.33 करोड़ टन था।