भारत की पहली खगोलीय वेधशाला 'एस्ट्रोसैट' के जरिए दुनिया के खगोलविदों ने सुदूर अंतरिक्ष में नए तारों के बनने की नायाब खोज की है। वैज्ञानिकों का यह अपनी तरह का पहला शोध है, जिसमें धरती से 3.9 तक अरब प्रकाश वर्ष दूर किसी छोटी (बौनी) गैलेक्सी को बनते हुए देखा।
इस घटना पर प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में इस महीने शोध लेख प्रकाशित हुआ है, जिसके प्रमुख लेखक भारतीय खगोलविद अंशुमान बोरगोहेन हैं। वह इस खोज में अमेरिका और फ्रांस के वैज्ञानिकों के साथ भारत की ओर से शामिल थे। बोरगोहेन तेजपुर विश्वविद्यालय के रूपज्योति गोगोई और पुणे स्थित इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स के प्रोफेसर कनक साहा की संयुक्त देखरेख में काम करते हैं, जो लेख के सह-लेखक हैं।
गैलेक्सी के विकास का पता लगाने में मददगार होगी खोज
शोध के मुताबिक, अतीत में बौनी गैलेक्सियों के मौजूदा स्वरूप लेने को लेकर साफ जानकारी नहीं है। लिहाजा, तारों के गठन को कैद करना किसी गैलेक्सी के बनने और उसके बड़े स्वरूप में विकसित होने का पता लगाने की अहम कड़ी है। इस कड़ी को ही भारत की पहली मल्टी वेवलेंथ स्पेस ऑब्जर्वेटरी एस्ट्रोसैट ने पकड़ा है।
इस पर लगी दूरबीन से खगोलविदों ने अरबों प्रकाश वर्ष दूर तारों का निर्माण देखा है। अध्ययन में शामिल अमेरिकी खगोलविद ब्रूस एल्मेग्रीन के मुताबिक, छोटी गैलेक्सी में सक्रिय रूप से तारों का निर्माण एक रहस्य रहा है। मौजूदा खोज से इसे समझने में मदद मिल सकती
है।