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Assault Rifles: सेना के लिए क्यों 'अबूझ पहेली' बनीं असॉल्ट राइफलें? AK-203 मिलने में हुई देरी, तो उठाया ये कदम

हरेंद्र चौधरी
Updated Mon, 26 Aug 2024 04:35 PM IST

सार

देश की इन्फैंट्री यानी पैदल सेना को 200,000 से ज्यादा 7.62x51 मिमी असॉल्ट राइफलों की सख्त जरूरत है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए INSAS (इंडियन स्मॉल आर्म्स सिस्टम) राइफलों की अपनी मौजूदा सूची को अपग्रेड करने की योजना शुरू की है।
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एके-203 और इंसास राइफल। - फोटो : अमर उजाला


बड़ी बात यह है कि इंसास राइफल में यह अपग्रेड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत किया जा रहा है। जिनमें स्वदेश में ही बनीं इंसास राइफलों को स्वदेशी कंपनी ही अपग्रेड कर रही है। वहीं इसके पार्ट्स भी स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चर किए गए हैं।



 

नॉर्दन कमांड ने दिया नई इंसास का ऑर्डर

प्रधानमंत्री मोदी के मॉस्को दौरे से पहले जुलाई में भारतीय सेना को 35,000 एके-203 कलाश्निकोव असॉल्ट राइफलों की डिलीवरी की गई थी। वहीं, इससे पहले मई में 27 हजार एके-203 राइफलें भारतीय सेना को सौंपी गई थीं। इन राइफलों को भारत-रूस ज्वॉइंट वेंचर के तहत उत्तर प्रदेश के अमेठी में बनाया जा रहा है। देश की इन्फैंट्री यानी पैदल सेना को 200,000 से ज्यादा 7.62x51 मिमी असॉल्ट राइफलों की सख्त जरूरत है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए INSAS (इंडियन स्मॉल आर्म्स सिस्टम) राइफलों की अपनी मौजूदा सूची को अपग्रेड करने की योजना शुरू की है। भारतीय सेना की नॉर्दन कमांड ने इंसास राइफलों के अपग्रेड करने और मॉडिफिकेशन करने के लिए व्यवहारिक और सस्ता उपाय तलाशा है। पाकिस्तान और चीन से सटी भारतीय सीमा की सुरक्षा कर रही नॉर्दन कमांड ने देहरादून की कंपनी स्टार एरोस्पेस के साथ इंसास राइफलों के अपग्रेडेशन और मॉडिफिकेशन के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है। इनमें से कुछ एडवांस इंसास राइफलों का पहला बैच नॉर्दन कमांड को सौंपा भी जा चुका है। हालांकि कुछ अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस ने पहले से ही भारत में निर्मित एडवांस इंसास का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है। वहीं, नॉर्दन कमांड की तरफ से अपग्रेडेशन को हरी झंडी मिलने से बाकी एस्टेब्लिशमेंट्स के लिए भी अपग्रेड इंसास खरीदने के रास्ते खुल गए हैं। 


नई इंसास में सारी सुविधाएं

स्टार एरोस्पेस के डायरेक्टर समीर धवन ने बताया कि उन्होंने गृह मंत्रालय की सिफारिश के बाद भारत में मॉडिफाइड इंसास के डिजाइन का पेटेंट कराया है। वहीं इसे अपग्रेड करने के लिए इसके पार्ट्स को डीआरडीओ के आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलेपमेंट एस्टेबिल्शमेंट (ARDE) की मदद से स्थानीय स्तर पर जुटाया है। उन्होंने बताया कि 75,000 रुपये की कीमत वाला कोई भी नया हथियार वर्तमान और भविष्य की युद्ध चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होना चाहिए। वहीं, इंसास को अपग्रेड करने में मात्र 45 फीसदी की लागत आई है, जिसमें सारी लेटेस्ट सुविधाएं मिलती हैं। धवन का दावा है कि उनकी कंपनी पहले से ही अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस को एडवांस INSAS राइफलें बना रही है और इसके नए डिजाइन को गृह मंत्रालय से भी मंजूरी मिल गई है।  


धवन के मुताबिक स्टार एयरोस्पेस का लक्ष्य इंसास राइफल को मॉडिफाइड करके मौजूदा हथियार को बेहतर बनाना है, जिसमें सभी परिस्थितियों में निरंतर फायर सुनिश्चित करने के लिए एक स्टेबल बट स्टॉक, रिकॉइल को कम करना, एक पिस्तौल की पकड़, एक हैंडगार्ड और एक स्लिंग शामिल है। इसके अलावा, ऑप्टिकल साइट्स को माउंट करने के लिए अटैचमेंट और ग्रिप्स या बाइपॉड लगाए गए हैं।   

खराब मैगजीन से जाम होती थी इंसास

सेना के सूत्रों ने बताया कि इंसास को अपग्रेड के पीछे बड़ी वजह इसकी मैगजीन को बदलना है, और साथ ही इसे ज़्यादा एर्गोनोमिक बनाना है, ताकि सैनिकों को ऑप्टिक्स, रिफ्लेक्स साइट, लाइट और लेजर जैसे आधुनिक साइटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करने में मदद मिल सके। साथ ही, मॉर्डेनाइजेशन किट में अलग किए जा सकने वाले साइड रेल के साथ ऊपरी और निचले हैंडगार्ड, फोल्डिंग टेलिस्कोपिक स्टॉक, एक नई पिस्टल ग्रिप, एक रेल्ड रिसीवर कवर और सबसे महत्वपूर्ण एक नई मैगज़ीन शामिल है। नई मैगजीन की क्षमता 30 राउंड की है और इसमें एक वर्टिकल विंडो है, जिससे शूटर देख सकता है कि मैगजीन में कितने राउंड हैं। सूत्रों का कहना है कि पुरानी इंसास जाम हो जाती थी, इसकी पीछे मुख्य वजह खराब मैगजीन ही थी। 
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असॉल्ट राइफल की खरीद प्रक्रिया मुश्किल

नॉर्दन कमांड के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा ने कहा कि एक असॉल्ट राइफल की खरीद/निर्माण की प्रक्रिया हमेशा से ही बड़ी कठिन रही है। भारतीय सेना अपनी जरूरतों के बारे में स्पष्ट नहीं है। सेना मुख्यालय कभी भी इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं था कि उसे किस तरह के हथियार की तलाश है। निर्माता आपके पास तभी आ सकते हैं, जब आप तय कर लें कि आपको क्या चाहिए। उन्होंने कहा कि सेना मुख्यालय की जटिल जनरल स्टाफ क्वॉलिटेटिव रिक्वॉयरमेंट्स (GSQRs), नए इक्विपमेंट्स के लिए स्पेसिफिकेशंस और स्टैंडर्ड तय करती है, ने भारतीय हथियार निर्माताओं को कन्फ्यूज कर दिया है। ये मानक जमीनी असलियतों से बिल्कुल परे हैं। 


INSAS राइफलों को रिटायर करने के पक्ष में नहीं है सेना

वहीं, रक्षा अधिकारियों का मानना है कि किसी भी छोटे हथियार प्रणाली को विकसित होने में लंबा समय लगता है। उदाहरण के तौर पर वे बताते हैं कि अमेरिकी एम4 असॉल्ट राइफल अपने शुरुआती मॉडल से 50 साल में विकसित हुई, जिसमें लगातार गुणवत्ता संबंधी समस्याएं भी रहीं। इसलिए भारतीय सेना भी INSAS राइफलों को रिटायर करने के पक्ष में नहीं है। इसकी वजह है कि इसकी लंबी बैरल, जो लंबी दूरी से भी लक्ष्य को सटीक रूप से हिट कर सकती है। दूसरा, इसका TRB (तीन-राउंड बर्स्ट) सिस्टम, एक लीवर के जरिए गोला-बारूद भी बचाया जा सकता है, इस प्रक्रिया में एक ही शॉट का सलेक्शन भी किया जा सकता है। तीसरा, ब्रीच सिस्टम में सेफ्टी सीयर और बिल्ट-इन डिले के जरिए मैकेनिकल सेफ्टी मिलती है। इसके अलावा, INSAS राइफल का रीलोडिंग टाइम कम है और कंट्रोल्ड रिकॉइल है, जिससे दुश्मन पर तेजी से और सटीक निशाना लगाने में मदद मिलती है। इसके अलावा इसका विशेष गोला-बारूद इसे भारतीय सेना के लिए खास बनाता है। 


सुरक्षा बलों के पास लगभग 10 लाख इंसास राइफलें 

बता दें कि भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों में लगभग 20 लाख असाल्ट राइफलें हैं, जिनमें INSAS, AK-203, AK-47, M4A1 कार्बाइन, T91 असॉल्ट राइफल, SIG सॉयर 716 और टेवर प्रमुख हैं। इस समय लगभग 10 लाख इंसास राइफलें उपयोग में हैं। सशस्त्र बल सेना सेवाओं में 810,000 असॉल्ट राइफलों का उपयोग किया जाता है, जिसमें अकेले सेना 7,60,000 राइफलों का उपयोग करती है। इतिहास के परिपेक्ष्य में देखें तो 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारतीय सेना के पास पुरानी एनफील्ड .303 राइफलें थीं, जबकि चीनी सैनिक उस समय एके-47 का इस्तेमाल कर रहे थे। इसी तरह, श्रीलंका में 1987 के शांति अभियान के दौरान, भारतीय सेना दो दशक पुरानी 7.62 सेल्फ-लोडिंग राइफलों के साथ लिट्टे गुरिल्लाओं का सामना कर रही थी, जबकि लिट्टे के पास एके-47 असाल्ट राइफलें थीं। जिसके बाद, भारतीय सेना को लिट्टे से लड़ने के लिए 10,000 एके-47 राइफलें खरीदनी पड़ीं थीं। वहीं जिस तरह से चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर तनातनी चल रही है, ऐसे में भारतीय सेना को नई असाल्ट राइफलें जुटा पाना बड़ी चुनौती है।  


पुरानी इंसास vs एके-203

अभी तक आतंकियों के खिलाफ काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशंस में सेना में एके-47 पर आंख मूंद कर भरोसा करती रही है। एके-47 राइफल एक मिनट में 600 राउंड दाग सकती है, इसकी रेंज भी 300 मीटर तक होती है। तो वहीं इंसास राइफल की क्षमता 600 से 650 गोलियां प्रति मिनट है। अब बात करें, एके-203 की, तो यह असाल्ट राइफल 700 गोलियां प्रति मिनट दाग सकती है। एके-203 राइफल इंसास से छोटी और वजन में हल्की है। इंसास का वजन जहां 4.15 किग्रा है, तो एके-203 का वजन 3.8 किग्रा है। वहीं एके-203 की बैरल लेंथ 415 एमएम है, जबकि इंसास की बैरल लैंथ 464 मिमी है। अनफोल्डेड एके-203 की लंबाई 943 एमएम और फोल्डेड बट के साथ लंबाई 704 एमएम है। जबकि इंसास की लंबाई 960 एमएम है। 


वहीं एके-203 में 7.62x39 एमएम की नाटो ग्रेड की बुलेट्स लगती हैं, जो ज्यादा घातक होती हैं। जबकि इंसास में 5.56x45 एमएम की गोलियां लगती हैं। इंसास की रेंज मात्र 400 मीटर है, जबकि एके-203 की रेंज 800 मीटर है। इंसास सिंगल शॉट और तीन-राउंड का बर्स्ट फायर करती है, तो वहीं एके-203 सेमी-ऑटोमैटिक या ऑटोमैटिक मोड में चलती है। एके-203 में 30 राउंड की बॉक्स मैगजीन लगती है। सैन्य सूत्र बताते हैं कि इंसास इंटेंस फायरिंग में जाम हो जाती है और इसमें ओवरहीटिंग की समस्या भी आती है। साथ ही मात्र 400 मीटर रेंज के चलते इंसास से आतंकियों की मौत क्लोज रेंज से फायर पर ही होती थी, जिससे वे घायल होने के बाद भी गोलियां चलाते रहते थे। 
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