गर्मी की छुट्टियों का मजा आम के रसीले स्वाद के बिना पूरा नहीं होता। मैंगो शेक बनाने से लेकर काटकर या चूसकर खाने का इसका मजा ही कुछ और होता है। अपनी खूबियों के कारण आम अब विदेशियों के दिलों पर भी राज करने लगा है। भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने विदेशी ग्राहकों की पसंद-नापसंद को ध्यान में रखते हुए आम की ऐसी किस्में विकसित की हैं जो उन्हें खूब पसंद आ रही हैं। इसके कारण विदेशों में आम की मांग बहुत बढ़ गई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन आमों की ऊंची कीमत भी मिलती है जिसके कारण भारतीय किसान इन्हें बेचकर खूब पैसा भी कमा रहे हैं। पूसा के कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा तैयार की गई आम्रपाली, पूसा लालिमा और पूसा अरुणिमा आम की ऐसी ही फसलें हैं। लाल चटखदार रंगों के कारण ये आम देखने में बेहद आकर्षक लगते हैं।
अलग होती है विदेशियों की पसंद
साधारण भारतीय खूब मीठा आम खाना पसंद करते हैं। यही कारण है कि उन्हें दशहरी, लंगड़ा और चौसा जैसे आम सबसे ज्यादा पसंद आते हैं जिनमें शूगर की मात्रा 22 से 24 फीसदी तक होती है। लेकिन विदेशी ग्राहक कम मीठे फल ज्यादा पसंद करते हैं। उनकी पसंद को ध्यान में रखते हुए ही आम्रपाली का विकास किया गया।
इसके आलावा दूसरी पीढ़ी के आमों में पूसा अरुणिमा, पूसा प्रतिभा, पूसा पीतांबर और पूसा लालिमा विकसित की गई हैं। इन आमों में शूगर की मात्रा 16 फीसद तक ही होती है। कम शूगर लेवल के कारण विदेशी ग्राहक इन्हें खूब पसंद करते हैं। कम मीठा होने के कारण डॉक्टर की सलाह पर इसे डाईबिटीज के मरीज भी खा सकते हैं।
कैसे बनी आम्रपाली
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर संजय कुमार सिंह ने अमर उजाला को बताया कि आम्रपाली से पहले आम की संकर किस्म की प्रजाति ‘मल्लिका’ विकसित की गई थी। यह नीलम आम पर दशहरी आम का क्रॉस था। भारतीय ग्राहकों के बीच यह काफी पसंद किया गया। विदेशी लोग इन्हें खा तो रहे थे लेकिन इनकी ज्यादा मिठास उन्हें कम पसंद आ रही थी। विदेशी ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए अपेक्षाकृत कम मीठे और कुछ खट्टे स्वाद वाली प्रजाति विकसित करने का निर्णय लिया गया।
इसके बाद दशहरी आम पर नीलम आम का क्रॉस कराया गया। इससे आम्रपाली का विकास हुआ जो अपने लाल सुर्ख रंग और हल्के खट्टे-मीठे स्वाद के कारण विदेशियों की पहली पसंद बन गया। आम्रपाली विदेशी ग्राहकों की पसंद के अनुरूप है। इस आम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें विटामिन की मात्रा अन्य आमों की तुलना में दो से ढाई गुना ज्यादा है। इसलिए जिन लोगों को विटामिन की कमी या रतौंधी जैसी बीमारी होती है, उनके लिए यह बेहद लाभप्रद है।
लाभप्रद है आम्रपाली की खेती
किसानों के लिए आम्रपाली आम की खेती बहुत लाभप्रद है। सामान्य भारतीय आम के पेड़ों की ऊंचाई बहुत अधिक और उनके बीच दूरी 10-12 मीटर होती है। इन आमों में प्रति हेक्टेयर महज छङ से आठ टन फसल पैदा होती है, जबकि आम्रपाली आम की फसल में पौधे तीन-साढ़े तीन मीटर ऊंचे होते हैं। इनके बीच की दूरी भी तीन मीटर तक रह सकती है। इनकी प्रति हेक्टेयर उपज 22-24 टन होती है। अच्छी क्वालिटी के कारण बाजार में इन आमों की कीमत भी बहुत अधिक मिलती है जिसके कारण किसान को खूब फायदा मिलता है।