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मिशन अंतरिक्ष में 2022 तक कामयाबी के सोपान गढ़ेगा इसरो, करेगा पीएम मोदी के सपने को साकार

Tue, 21 Aug 2018 08:04 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भारत पहली बार किसी भारतीय अंतरिक्ष यात्री को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर रहा है। इस अभियान में  10,000 करोड़ से भी कम खर्च आने की उम्मीद है।  इसरो के मुताबिक मानव मिशन 2022 के तहत भारत अपने लक्ष्य को हासिल कर लेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो को अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए चार साल का वक्त दिया है। हमारी योजना है कि अंतरिक्ष यात्री कम से कम सात दिनों तक अंतरिक्ष में रहें। 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से कहा कि 2022 में जब देश आजादी की 75वां सालगिरह मना रहा होगा तब भारत का बेटा या बेटी अंतरिक्ष में होगा और तिरंगा लहराएगा। 
अगर यह होता है तो भारत दुनिया में चौथा ऐसा देश होगा जिसने मानवयान अंतरिक्ष में भेजा हो। फिलहाल अमेरिका, रूस और चीन ही मानवयान को अंतरिक्ष में भेजने में समर्थ हैं। इसरो के अध्यक्ष के. सिवान कह चुके हैं कि इसरो के पास क्रू मॉड्यूल है, क्रू इस्केप सिस्टम का इसी साल टेस्ट किया जा चुका है और हमारे पास लांच व्हीकल भी मौजूद हैं। 
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कैसे प्रयास कर रहे हैं इसरो

अंतरिक्ष में भारत माता की संतान उड़ान भरे, इसके लिए इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) लगातार प्रयास कर रहा है। हाल ही में उसे एक बड़ी सफलता तब मिली थी, जब उसने क्रू एस्केप सिस्टम का सफल परीक्षण किया था। इसरो के मुताबिक क्रू एस्केप सिस्टम अंतरिक्ष अभियान को रोके जाने की स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों को वहां से निकलने में मदद करने के लिए है। इससे पहले सिर्फ तीन देशों-अमेरिका, रूस और चीन के पास इस तरह की सुविधा थी। 

क्रू एस्केप सिस्टम क्या है? 

किसी अंतरिक्ष यात्री को स्पेस में भेजे जाने के दौरान जब रॉकेट लांच पैड से छोड़ा जाता है तब क्रू को सबसे ज्यादा खतरा होता है। लांच पैड पर होने के दौरान अगर फट जाए या रॉकेट में आग लग जाए या कुछ गड़बड़ी हो जाए तो उस वक्त अंतरिक्ष यात्रियों को कैसे बचा सकते हैं, इसके लिए एक टेस्ट होता है जिसे भारत ने पहली ही बार में पास कर एक उपलब्धि हासिल की है। इसके बिना यात्री अंतरिक्ष में नहीं जा सकता है। पीएम मोदी की भारत माता की संतान को 2022 तक अंतरिक्ष में भेजने के संकल्प में क्रू एस्केप सिस्टम के सफल परीक्षण का होना सफलता का एक महत्वपूर्ण सोपान चढ़ना माना जा सकता है। 

यात्रियों को अंतरिक्ष भेजने की क्या है तैयारी 

2007 में सैटेलाइट रीएंट्री परीक्षण, 2014 में जब जियोसिंक्रोनस उपग्रह प्रक्षेपण वाहन (जीएसएलवी) मार्क-3 का परीक्षण हुआ था, तब भारत ने एक डमी क्रू मॉड्यूल टेस्ट किया था। उसके साथ- साथ अंतरिक्ष यात्रियों के स्पेस सूट का टेस्ट भी हुआ है। बहुत सारे परीक्षण साथ -साथ चलते रहे हैं। इसरो छोटे -छोटे कदम उठाकर सूक्ष्म तकनीक के विकास में लगा है। वह अंतरिक्ष में भारतीयों को भेजने की तैयारी कर रहा है, ताकि जब सरकार से अंतरिक्षयात्रियों को भेजने की हरी झंडी मिले तो वो आसानी से और जल्दी ऐसा कर सके। 

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 हम होंगे दुनिया के चौथे देश 

अभी तक "ह्यूमन स्पेस फ्लाइट' करने वाले केवल तीन ही देश हुए हैं- रूस, अमेरिका और चीन। इन तीनों स्पेस में अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने और वापस लाने के मामले में आत्मनिर्भर हैं। अगर भारत अंतरिक्ष में यात्री भेजने में कामयाब रहा तो वो ऐसा करने वाला चौथा देश बन जाएगा। अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसरो लगातार बहुत अहम छलांग लगा रहा है और "क्रू मॉड्यूल स्केप सिस्टम" का टेस्ट "ह्यूमन स्पेस फ्लाइट' के लिए बहुत अहम था। इसरो के मुताबिक भारतीय मानव को एक सप्ताह तक अंतरिक्ष में रखने योग्य क्षमता हासिल की गई है। उसके लिए जरूरी स्पेस सूट आदि का भी विकास किया जा चुका है। यही नहीं, भारत अब 5 से 8 टन वजन वाले पेलोड अंतरिक्ष में स्थापित करने वाले भारी वजन वाले प्रक्षेपण यान भेजने की तैयारी शुरू कर दी है। 

क्या है विशेषज्ञों की राय 

हालांकि विशेषज्ञों की मानें तो प्रधानमंत्री की महत्वकांक्षा इसरो के सामने बड़ी चुनौती है। भारत के इस मानवयान में अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की एक टीम जाएगी जो पृथ्वी का चक्कर लगाएगी। भारत में बने जियोसिंक्रोनस सैटलाइट लांच व्हिकल (जीएसएलवी-III) की मदद से वैज्ञानिक अंतरिक्ष में जाएंगे। इस मिशन से पहले उम्मीद है कि इसरो की ओर से भेजे गए दो मानवरहित यानों का काम पूरा हो जाएगा। इस मिशन में 10 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। अमेरिकी विशेषज्ञ इसरो के मिशन को चुनौतीपूर्ण मानते हैं। उनका मानना है कि इसरो ने यकीनन कुछ महत्वपूर्ण तकनीक पर काम किया है, लेकिन चार साल में इतनी बढ़त पाने के लिए के लिए इसरो को कई तरह के संसाधनों की जरूरत पड़ेगी। 

वैज्ञानिक डॉ. आर रामचंद्रन कहते हैं कि इसरो के मौजूदा स्थिति को देखते हुए मानवयान का मिशन जल्द पूरा होना एक बड़ी चुनौती है। इसरो ने मानवयान से जुड़ी तकनीक पर काम किया है, लेकिन अगर वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में भेजना है तो उससे पहले कम से कम चार मानवरहित यानों को भेजकर सुरक्षा का जायजा लेना होगा। इसरो के लिए यह तय समय पर करना बड़ी चुनौती होगा। वैसे यदि 2022 का मिशन सफल होता है तो उसके बाद इसरो चंद्रमा और सूर्य के मिशन पर जुट जाएगा। भारत के सोलर मिशन आदित्य-एल1 के जरिए इसरो को उम्मीद है कि सौर आंधी और ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ा योगदान संभव हो सकेगा। 

क्या कहते हैं आलोचक 

आलोचक कहते हैं कि विकासशील देश भारत को पहले गरीबी और भुखमरी जैसे मुद्दों पर निवेश करना चाहिए। वहीं, अंतरिक्ष कार्यक्रमों के समर्थक मानते हैं कि अगर विज्ञान में निवेश किया जाए तो तकनीक, शिक्षा और आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनने में मदद मिलती है। इसरो के सैटलाइट ही भारत में बाढ़ और सूखे के बारे में सचेत करते हैं। 

- 1 अरब डॉलर औसतन हर साल स्पेस रिसर्च के लिए निवेश किए गए हैं। 

- लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक अंतरिक्ष में मानवयान भेजने की बात कही है। इसरो के लिए ये एक बड़ी चुनौती है। जानें क्या और कैसी है इसरो की तैयारियां... 

- 2014 में ही भारत ने मंगलयान भेजा और उससे पहले 2008 में चंद्रमा पर स्पेसक्राफ्ट भेजा। 

- 104 सैटेलाइट पिछले साल यानी 2017 में भेजने का रिकॉर्ड बनाया।

कम दूरी की कक्षा में भेजेंगे सबसे पहले 

जब भारत पहली बार अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजेगा तो उन्हें धरती की कम दूरी की कक्षा (लो अर्थ ऑरबिट) में भेजा जाएगा, ताकि उन्हें सफलतापूर्वक वापस भी लाया जाए। ये उपग्रह की तरह नहीं होते हैं जहां रोबोटिक मिशन होते हैं। यहां भेजे गए अंतरिक्ष यात्रियों को हर हालत में सुरक्षित वापस लाने के लिए तकनीक की मजबूती और उसकी गुणवत्ता बहुत अधिक होना जरूरी है। भारत अभी उसकी ओर कदम बढ़ा रहा है। 
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