भारत में तुर्की को लेकर नाराजगी की एक वजह उसके पाकिस्तान से अच्छे संबंध भी है। तुर्की के पाक से संबंध भारत के मुकाबले काफी बेहतर रहे हैं। जुलाई 2016 में जब तुर्की में आर्दोआन के खिलाफ सेना की तख्तापलट की कोशिश नाकाम रही थी तो पाकिस्तान आर्दोआन के समर्थन में आया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने फोन कर आर्दोआन को समर्थन देने की बात कही थी। बाद में शरीफ ने तुर्की का दौरा भी किया था।
इसके एक साल बाद यानी 2017 में तुर्की ने पाकिस्तान में एक अरब डॉलर का निवेश किया था। साथ ही उसने पाकिस्तान में कई परियोजनाओं पर भी काम शुरू किया था। तुर्की पाकिस्तान को मेट्रो बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम उपलब्ध कराता रहा है। दोनों के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (मुक्त व्यापार समझौता) पर भी काम चल रहा है। इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार 90 करोड़ डॉलर से बड़ कर 10 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
पाकिस्तान में तुर्की एयरलाइंस का भी विस्तार हुआ है। पश्चिमी देशों में जाने वाले ज्यादातर पाकिस्तानी नागरिक भी तुर्की के रास्ते ही जाते हैं। पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान खान भी आर्दोआन के प्रशंसक रहे हैं। साल 2016 में तुर्की में तख्तापलट की कोशिश असफल रहने पर इमरान के आर्दोआन को नायक की संज्ञा दी थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध और एकता दशकों से बनी हुई है।
भारत और तुर्की के आपसी नागरिक संबंधों की बात करें तो यहां भी पाकिस्तान भारत से कहीं आगे है। दरअसल, भारत और तुर्की के नागरिक एक-दूसरे को ठीक से जानते नहीं है और ऐसे में आपसी पूर्वाग्रह दूर करने का कोई रास्ता नहीं है। तुर्की में पाकिस्तान के नागरिकों की छवि 'भाई' की है तो भारतीयों की छवि 'गोपूजक' की। ऐसी स्थितियों में मूल आधार पर पाकिस्तान और तुर्की के संबंध ज्यादा बेहतर हैं और कश्मीर जैसे मामलों में तुर्की उसके साथ खड़ा होता है।
भारत में तुर्की के प्रति नाराजगी का एक और कारण तख्तापलट की कोशिश के दौरान वहां मानवाधिकारों का हनन भी रहा। इस दौरान में तुर्की 15 विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए थे। इनमें पढ़ने वाले कई भारतीय छात्रों को पढ़ाई बीच में छोड़कर वापस भारत लौटना पड़ा था। इसके अलावा इन विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले कई भारतीय प्रोफेसरों की नौकरी चली गई थी। तुर्की सरकार ने इन प्रोफेसरों के बैंक खाते कई महीनों तक बंद कर दिए थे।