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India-Sweden Relations: विकास, मजबूती और टिकाऊ भविष्य; भारत और स्वीडन मिलकर दिखा रहे हैं दुनिया को रास्ता

Tue, 19 May 2026 04:21 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए भारत और स्वीडन ने साझा सहयोग का आह्वान किया है। भारत का लक्ष्य 2047 तक विकसित देश और 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करना है। वहीं, स्वीडन का ग्रिड 98% जीवाश्म ईंधन-मुक्त हो चुका है। दोनों देशों ने 'लीडरशिप ग्रुप फॉर इंडस्ट्री ट्रांजिशन' के जरिए उद्योगों में कार्बन कम करने और मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए हरित परिवर्तन को जरूरी बताया है।
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विस्तार
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आज पूरी दुनिया एक बहुत ही मुश्किल दौर से गुजर रही है। एक तरफ जहां देशों के बीच आपसी तनाव और युद्ध जैसी स्थितियां हैं, वहीं दूसरी तरफ ऊर्जा (बिजली और ईंधन) का संकट और अर्थव्यवस्थाओं का डगमगाना भी एक बड़ी परेशानी बना हुआ है। ऐसे गंभीर समय में हमारे सामने दो ही रास्ते बचते हैं। पहला यह कि हर देश सिर्फ अपने फायदे के बारे में सोचे और सिमट कर रह जाए। दूसरा रास्ता यह है कि देश आपस में ऐसे मजबूत रिश्ते और साझेदारी बनाएं, जिससे सबका विकास हो, अर्थव्यवस्थाएं मजबूत हों और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य (टिकाऊ भविष्य) बन सके। यह समय एकजुट होकर काम करने का है।
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संयुक्त राष्ट्र (यूएन) जब अपनी स्थापना की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब यह बात और भी साफ हो जाती है कि दुनिया को अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कितनी जरूरत है। अंतरराष्ट्रीय नियमों पर चलने वाली व्यवस्था ने ही दुनिया को कई तक शांति और विकास दिया है। लेकिन आज हमारे सामने जलवायु परिवर्तन (मौसम में हो रहे खतरनाक बदलाव), उद्योगों में जरूरी बदलाव, सप्लाई चेन की रुकावटें और ऊर्जा के नए तरीकों को अपनाने जैसी बहुत बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। इन सभी समस्याओं से कोई भी देश अकेले नहीं निपट सकता है। इसके लिए सभी देशों को एक साथ मिलकर और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलने की बहुत सख्त जरूरत है।
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जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्या हैं भारत के बड़े लक्ष्य?
जलवायु परिवर्तन का बुरा असर भारत, स्वीडन और दुनिया के लगभग हर हिस्से पर पड़ रहा है। आज भी करोड़ों-अरबों लोग एक अच्छी जिंदगी, रोजगार और बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं। भारत दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारत ने यह तय किया है कि वह विकास भी करेगा और पर्यावरण को भी बचाएगा। इसके लिए भारत ने दो बहुत बड़े लक्ष्य रखे हैं। पहला, साल 2047 तक भारत को एक पूरी तरह से विकसित देश बनाना। दूसरा, 2070 तक देश में कार्बन का उत्सर्जन बिल्कुल जीरो (नेट जीरो) कर देना। भारत दुनिया को यह दिखा रहा है कि तरक्की और पर्यावरण सुरक्षा दोनों एक साथ किए जा सकते हैं।
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स्वीडन ने पर्यावरण को बचाने के लिए क्या किया है बड़ा काम?
यूरोप में स्वीडन एक ऐसा देश है, जो पर्यावरण को बचाने के मामले में सबसे आगे चल रहा है। स्वीडन ने बहुत ही कड़े और साहसिक फैसले लिए हैं। इसका नतीजा यह है कि वहां की 98% बिजली अब बिना कोयले या तेल (जीवाश्म ईंधन) के बन रही है। 1990 के बाद से स्वीडन ने अपने यहां फैलने वाले प्रदूषण (उत्सर्जन) को एक-तिहाई से भी ज्यादा कम कर दिया है, और हैरानी की बात यह है कि इस दौरान उनकी अर्थव्यवस्था का आकार भी दोगुना हो गया। स्वीडन ने साबित कर दिया है कि हरित ऊर्जा (ग्रीन एनर्जी) अपनाने से देश गरीब नहीं होता, बल्कि और अमीर होता है।

'लीडरशिप ग्रुप फॉर इंडस्ट्री ट्रांजिशन' से दुनिया को क्या होगा फायदा?
भारत और स्वीडन ने मिलकर साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र के साथ 'लीडरशिप ग्रुप फॉर इंडस्ट्री ट्रांजिशन' नाम की एक बहुत बड़ी पहल शुरू की थी। इसका मुख्य काम उन भारी उद्योगों में कार्बन उत्सर्जन को कम करना है, जहां इसे कम करना बहुत मुश्किल माना जाता है, जैसे कि स्टील और सीमेंट उद्योग। यह पहल साबित करती है कि अगर विकसित और विकासशील देश एक-दूसरे पर भरोसा करें और नई तकनीक का इस्तेमाल करें, तो हर बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है। इससे यह भी साफ है कि हरित परिवर्तन केवल पर्यावरण की जरूरत नहीं है, बल्कि इससे देश की अर्थव्यवस्था भी बहुत ज्यादा मजबूत होती है।
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