आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत के पास वैश्विक चिप डिजाइनिंग वर्कफोर्स का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा है। इसके अलावा इंटेल इंडिया और इंट्रोडक्शन टू सेमीकंडक्टर जैसे कोर्सेस की मदद से देश में हजारों की संख्या में इंजीनियर्स को इस क्षेत्र में प्रशिक्षित किया जा रहा है।
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के मुताबिक भारत अपनी इस कुशल प्रतिभा और बड़े घरेलू बाजार की मदद से सेमीकंडक्टर की वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी एक मजबूत हिस्सेदारी बनाने की स्थिति में है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत वर्तमान में 28nm से 90nm सेगमेंट पर काम कर रहा है। वहीं सरकार 2035 तक अत्याधुनिक 3nm और 2nm सेमीकंडक्टर चिप्स का निर्माण करना चाहती है।
क्या हैं बड़ी चुनौतियां?
सेमीकंडक्टर फैक्ट्री चलाना सिर्फ आधुनिक मशीनें लगाने तक सीमित नहीं है। चिप बनाने की प्रक्रिया में बेहद शुद्ध पानी की जरूरत होती है। एक मध्यम आकार की फैक्ट्री में रोजाना करीब 2 से 3 करोड़ लीटर अल्ट्रा-प्योर वॉटर इस्तेमाल हो सकता है। इसके साथ ही उत्पादन को लगातार जारी रखने के लिए चौबीसों घंटे बिना रुकावट बिजली की आपूर्ति जरूरी है। बिजली में कुछ पल की गड़बड़ी भी उत्पादन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है और करोड़ों रुपये के चिप वेफर्स खराब होने का खतरा पैदा कर सकती है।
इस कारण सेमीकंडक्टर क्षेत्र में फैब्रिकेशन प्लांट स्थापित करने के लिए संसाधनों की उपलब्धता और बिजली की स्थिर आपूर्ति को महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में देखा जाता है। चिप निर्माण के लिए पर्याप्त शुद्ध पानी, भरोसेमंद बिजली और मजबूत बुनियादी ढांचा जरूरी है। इसलिए भारत में सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियां स्थापित करने की योजना बनाते समय इन जरूरतों को पूरा करना एक बड़ी चुनौती है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सेमीकंडक्टर चिप बनाने के लिए 300 से अधिक प्रकार के विशेष रसायनों, अल्ट्रा-प्योर नियॉन और हीलियम जैसी गैसों तथा गैलियम और जर्मेनियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की जरूरत होती है। इसके अलावा चिप निर्माण में इस्तेमाल होने वाली लिथोग्राफी मशीनें भी बेहद जरूरी हैं।
गौर करने वाली बात है कि इन कच्चे मालों और अत्याधुनिक मशीनों की आपूर्ति के लिए भारत काफी हद तक दूसरे देशों पर निर्भर है। इनमें ताइवान, जापान, अमेरिका और यूरोप के वैश्विक सप्लायर्स शामिल हैं। सरकार ने यह खुद स्वीकार किया है कि सेमीकंडक्टर के लिए कच्चे माल के घरेलू इकोसिस्टम की कमी देश के लिए एक बड़ी चुनौती है।