संयुक्त राष्ट्र (यूएन) जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने सभी सदस्य देशों से सितंबर तक अपने जलवायु लक्ष्य जमा करने की अपील की है। इन्हें जमा करने की आखिरी तारीख 10 फरवरी थी, लेकिन भारत सहित कई देश राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) यानी जलवायु कार्य योजना को इस वक्त पूरा नहीं कर पाएंगे। एक सरकारी अधिकारी के मुताबिक, भारत अपने अगले जलवायु लक्ष्यों को ब्राजील में होने जा रहे यूएन जलवायु सम्मेलन के नजदीक जमा कर सकता है और ये लक्ष्य देश के उपलब्ध संसाधनों पर आधारित होंगे।
हर देश को 2031-2035 की अवधि के लिए एनडीसी इस साल जमा करना जरूरी है। इस अधिकारी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अन्य तरीकों के साथ -साथ वित्तीय और तकनीकी सहयोग की जरूरत होती है, लेकिन विकसित देश यह सहयोग को देने के लिए तैयार नहीं हैं। जो देश जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, उन्हें इसका नुकसान क्यों उठाना चाहिए? अधिकारी का कहना है कि भारत ने अभी तक अपने नए जलवायु लक्ष्य तय नहीं किए हैं। देस ऐसे लक्ष्य बनाएगा जो उसके उपलब्ध संसाधनों से पूरे किए जा सकें।
पर्याप्त फंडिंग न मिलने पर भारत बदल सकता है अपने जलवायु लक्ष्य
संसद में जनवरी में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में कहा गया कि अगर विकसित देश पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं देते हैं, तो विकासशील देश अपने जलवायु लक्ष्य दोबारा तय कर सकते हैं। भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन कहते हैं कि जलवायु कार्रवाई के लिए भारत को मुख्य रूप से अपने संसाधनों पर निर्भर रहना होगा, क्योंकि विकसित देश पर्याप्त मदद नहीं दे रहे हैं।
देश ने अधिकतर जलवायु परियोजनाएं खुद के संसाधनों से कीं पूरी
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बृहस्पतिवार को संसद को बताया कि भारत को यूएन जलवायु कोषों के जरिए अब तक 1.16 अरब डॉलर की जलवायु वित्तीय सहायता मिली है। इसमें ग्रीन क्लाइमेट फंड से 803.9 मिलियन डॉलर, वैश्विक पर्यावरण सुविधा से 346.52 मिलियन डॉलर और अनुकूलन निधि से 16.86 मिलियन डॉलर मिले हैं। हालांकि, भारत ने अधिकतर जलवायु परियोजनाएं अपने ही संसाधनों से पूरी की हैं।
कई विकसित देशों से भी अधिक दिया जलवायु वित्त पोषण में योगदान
यूके के थिंक टैंक ओडीआई और ज्यूरिख क्लाइमेट रेजिलिएंस एलायंस ने 2024 में जलवायु वित्त पोषण पर एक अध्ययन किया।इसमें पाया गया कि भारत ने 2022 में 1.28 अरब डॉलर जलवायु वित्त पोषण के तौर पर दिया। यह कई विकसित देशों के योगदान से भी अधिक था। 2022 में महज 12 विकसित देशों ने अपनी उचित हिस्सेदारी की जलवायु वित्त मदद दी। इन देशों में नॉर्वे, फ्रांस, लक्जमबर्ग, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, जापान, नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम और फिनलैंड शामिल हैं।
अमीर देशों ने पूरे नहीं किए वित्तीय वादे
विकसित देशों ने 2009 में यह वादा किया था कि वे 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर देंगे ताकि विकासशील देश जलवायु परिवर्तन से निपट सकें। हालांकि, यह लक्ष्य 2020 में ही पूरा हो पाया, लेकिन तब भी 70 फीसदी राशि विकसित देशों ने विकासशील देशों को कर्ज के तौर पर दी न कि अनुदान के तौर पर। बीते साल अजरबैजान की राजधानी बाकू में हुए कॉप 29 विकसित देशों से उम्मीद थी कि वे जलवायु कार्रवाई के लिए नई और अधिक वित्तीय मदद का एलान करेंगे, लेकिन इसके बजाय, उन्होंने 2035 तक महज 300 अरब डॉलर देने का वादा किया, जबकि 2025 से हर साल असल में 1.3 खरब डॉलर की जरूरत है। भारत ने इस छोटी रकम को बहुत कम, बहुत देर से नगण्य और आंखों का धोखा कहा।
वैश्विक तापमान नियंत्रण में विकसित देशों की जिम्मेदारी
इन जलवायु योजनाओं का मुख्य लक्ष्य औद्योगिक क्रांति के बाद से वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है। यह 2015 पेरिस समझौते का एक अहम हिस्सा है। 1992 के जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) समझौते के तहत ऐतिहासिक रूप से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार अमीर विकसित देशों को विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता हासिल करने के लिए वित्तीय और तकनीकी मदद देनी होती है। इन विकसित देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड यूरोपीय संघ के सदस्य देश जैसे जर्मनी और फ्रांस शामिल हैं।