भारत में कोरोना संक्रमण के मामले कम होने लगे हैं, लेकिन बड़ी मात्रा में बायोमेडिकल कचरे ने चिंता बढ़ा दी है। भारत में एक साल में 45 हजार टन बायोमेडिकल वेस्ट निकला है। मेडिकल कचरा इंफेक्शन बढ़ा रहा है।
कोरोना वायरस की दूसरी लहर भले ही सुस्त पड़ गई हो, लेकिन यह अपने पीछे एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। देश में हर रोज 146 टन बायोमेडिकल वेस्ट निकल रहा है। इससे इंफेक्शन बढ़ने का खतरा बढ़ गया है। कोरोना की दूसरी लहर से भारी संख्या में जान-माल का नुकसान हुआ है। अब बायोमेडिकल कचरे के इजाफा ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, भारत प्रतिदिन लगभग 146 टन बायोमेडिकल कचरा उत्पन्न कर रहा है। पिछले एक साल में 45 हजार टन कचरा निकला है।
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पर्यावरण और इंसान के लिए जानलेवा
बायोमेडिकल वेस्ट में पीपीई किट, मास्क, गलव्ज, पैथोलॉजिकल कचरा, प्लास्टर ऑफ पेरिस, ब्लड बैग, यूरिन बैग्स, डायलिसिस किट्स, आईवी सेट्स, केमिकल कचरा जैसी कई चीजें शामिल हैं। बायोमेडिकल डिस्पोज नहीं होने पर पर्यावरण के साथ-साथ लोगों के लिए भी खतरनाक हो सकता है।
कोविड वेस्ट डिस्पोज के लिए गाइडलाइंस तय
गौरतलब है कि भारत के सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) ने देशभर में कोविड कचरे को डिस्पोज करने के लिए नई गाइडलाइंस तय की है। बोर्ड ने कोरोना मरीजों के इलाज के दौरान पैदा हुए कचरे को इसी गाइडलाइंस के तहत डिस्पोज किया जाना है। बोर्ड ने बताया कि फिलहाल भारत में 198 कॉमन बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित की गई है।
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सरकार ने नए नियम बनाए
सरकार के नियमों के मुताबिक, बायोमेडिकल कचरे को तीन तरह के बैगों में कलेक्ट किया जाना है। इनमें यैलो बैग(जलाने वाला कचरा), रेड बैग (रिसाइकिल वाला कचरा) और व्हाइट बैग (कांच से जुड़ा कचरा) शामिल है।