करीब ढाई महीने बाद डोकलाम विवाद में चीन को मिली मुंहकी भारत की विकल्पहीनता का नतीजा थी। दरअसल इस विवाद में भारत के पास डटे रहने या फिर बहुत कुछ गंवाने के लिए तैयार रहने का विकल्प था।
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ऐसे में भारत ने डटे रहने का विकल्प अपनाया और चीन की युद्घ की धमकी और दबाव का मौन कूटनीति के जरिए सफलतापूर्वक सामना किया। ऐसा नहीं है कि भारत ने चीन की धमकियों का जवाब नहीं दिया।
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भारत ने इस मामले में चीन से जुबानी जंग में उलझने के बदले कूटनीतिक चैनल से लगातार हर स्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार रहने का बार-बार संदेश दिया। चीन की सार्वजनिक ना के बाद जी-20 सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम नरेंद्र मोदी की मुलाकात ने भारत की कूटनीतिक सफलता के सही राह पर होने का संदेश दिया।
चीन का कब्जा भारत की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी थी
Doklam Dispute
इस पूरे मामले से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक भारत को पता था कि भूटान के क्षेत्र में चीनी सेना को निर्माण कार्य रोकने पर मजबूर करने पर कूटनीतिक तनातनी बढ़ेगी। चूंकि दोकमल सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण था और वहां चीन का कब्जा भारत की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी थी।
इसके अलावा यह भारत की पड़ोसी देशों में ही नहीं बल्कि दुनिया में बनी साख का भी सवाल था। ऐसे में दोकलम क्षेत्र में सेना भेजने के साथ ही भारत ने चीन के हर दांव से पार पाने की ठोस कूटनीतिक, सामरिक और राजनीतिक रणनीति तैयार कर ली थी।
एक बार दोकलम में डटने के बाद पीछे हटने का मतलब विस्तारवादी नीति के लिए कुख्यात चीन को भारत को बार-बार परेशान करने का मौका देना भी था। इस मोर्चे पर पीछे हटने का मतलब चीन का न सिर्फ भुटान और नेपाल में दखल बढ़ने का अंदेशा था, बल्कि भारत से दशकों पुराने सीमा विवाद मामले में भी उसके आक्रामक तेवरों में और बढ़ोत्तरी की भी पूरी संभावना थी।
यही कारण है कि भारत ने एक बार दोकलम में सेना की तैनाती के बाद इसी शर्त पर पीछे हटने का प्रस्ताव रखा जब चीन भी साथ-साथ अपनी सेना को पीछे हटने का निर्देश दे। भारत को पता था कि चीन भारत पर दबाव बनाने के लिए युद्घ की धमकी से ले कर कई अन्य तरह के दांव आजमाएगा।
उसकी पूरी कोशिश भारत को जुबानी जंग में उलझाने की भी थी। उक्त अधिकारी के मुताबिक ऐसा नहीं है कि चीन को युद्घ की धमकी और उसकी ओर से बनाए गए दबाव का भारत की ओर से जवाब नहीं दिया गया।
भारत ने चीन की तरह सार्वजनिक जुबानी जंग में उलझने के बदले कूटनीतिक चैनल से होने वाली हर बातचीत में यह संदेश दिया कि इस मुद्दे पर वह हर स्थिति को झेलने और जवाब देने के लिए तैयार है।
भले ही जी-20 सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम नरेंद्र मोदी की बातचीत में कोई हल नहीं निकला, मगर इससे यह संदेश जरूर मिला कि भारत की मौन रह कर अपने स्टैंड पर डटे रहने की कूटनीति काम कर रही है।
क्योंकि तब चीन ने आधिकारिक रूप से जिनपिंग-मोदी मुलाकात की संभावना को खारिज किया था। इसके बावजूद मुलाकात से यह संदेश गया कि चीन इस विवाद को सुलझाने का इच्छुक है।