विधि आयोग ने वर्ष 1987 में प्रति 10 लाख लोगों पर कम से कम 50 जजों की जरूरत बताई थी। बावजूद इसके वर्तमान में अनुपात 10 लाख लोगों पर 19 जज का है। नतीजा...लंबित मुकदमों का बढ़ता बोझ, जो वर्तमान में 4.8 करोड़ तक पहुंच चुका है। यह चौंकाने वाले तथ्य मंगलवार को जारी इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (आईजेआर) 2-022 में सामने आए हैं। इसमें लोगों को न्याय देने के आधार पर राज्यवार रैंकिंग भी दी गई है। रिपोर्ट कहती है, एक करोड़ से अधिक आबादी वाले 18 राज्यों में कर्नाटक इस मामले में शीर्ष पर है, तो उत्तर प्रदेश सबसे नीचे। खास बात यह है कि इस रैंकिंग में शीर्ष पांच राज्यों में चार राज्य दक्षिण भारत से हैं।
अभी और काम की जरूरत
वंचित वर्ग काे उचित प्रतिनिधित्व सिर्फ कर्नाटक में
कर्नाटक में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग का पुलिस अधिकारियों व स्टाफ में उचित प्रतिनिधित्व है। गुजरात व छत्तीसगढ़ में एससी, अरुणाचल प्रदेश, तेलंगाना व उत्तराखंड में एसटी और केरल, सिक्किम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना व तमिलनाडु में ओबीसी वर्ग का पुलिस में तय प्रतिनिधित्व है। किसी भी राज्य की सहायक व जिला अदालतों में तीनों वर्गों का निर्धारित कोटा पूरा नहीं है।
554 साल लगेंगे त्रिपुरा को 33% महिला पुलिसकर्मी रखने में
रिपोर्ट ने रोचक ढंग से बताया कि राज्यों में महिला पुलिसकर्मी मौजूदा दर से बढ़ती रहीं तो अनुपात 33 प्रतिशत पहुंचाने में कितने वर्ष लगेंगे? इनमें त्रिपुरा को सबसे ज्यादा 554 वर्ष, पुडुचेरी को 318 वर्ष, अंडमान-निकोबार को 226 वर्ष, झारखंड को 206 वर्ष और राजस्थान को 103 वर्ष लगने का अनुमान दिया गया। वहीं यूपी को इसमें 6 वर्ष, हरियाणा को 27, पंजाब को 25, उत्तराखंड को 20 और हिमाचल प्रदेश को 53 वर्ष लगेंगे।
सिक्किम-चंडीगढ़ की खास उपलब्धि
रैंकिंग में उत्तर भारत