ब्लैक होल(सांकेतिक तस्वीर)
थर्टी मीटर टेलीस्कोप (टीएमटी) प्रोजेक्ट में तीन भारतीय कंपनियों, गोल, अवसराला और गोदरेज एंड बॉयस को भी काम सौंपा गया है। ये कंपनियां टेलीस्कोप के लिए 700 करोड़ के कंपोनेंट बनाएगी। इस टेलीस्कोप के लिए ऐसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा, जो अभी हैं ही नहीं।
गोल कंपनी के एक अधिकारी की मानें तो इससे ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित करने में मदद मिलेगी, जो दुनिया के कुछ चुनिंदा देशों के पास ही होगी। इस टेलीस्कोप के लिए 30 मीटर के डायमीटर वाले सिंगल मिरर की जरूरत पड़ेगी। इन्हें 492 पार्ट्स में बांटा जाएगा और बाद में असेंबल किया जाएगा। इनमें से 100 पार्ट्स भारत बनाएगा।
टीएमटी दूरबीन में भारतीय वैज्ञानिकों को मिलेंगी 30 रातें
इस टेलीस्कोप के निर्माण के बाद भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को वर्ष में 25-30 रातों तक इस पर काम करने का मौका मिलेगा। यह भारत के लिए बड़ी बात है। वर्तमान में 10 मीटर के टेलीस्कोप पर साल में सिर्फ एक रात का समय मांगना भी भारत के लिए बहुत मुश्किल होता है।
इसके लिए कई बार आवेदन करने पड़ते हैं। टीएमटी में भारतीय वैज्ञानिकों को 30 रातें बिताने पर कई अहम जानकारियां प्राप्त होंगी, जो देश के लिए बहुत काम की हो सकती हैं।
विश्व में कई बड़ी दूरबीन पहले से भी मौजूद हैं
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टीएमटी को विश्व की सबसे बड़ी दूरबीन बनाए जाने का दावा किया जा रहा है। जिस तरह का टेलीस्कोप लद्दाख में लगाने की चर्चा चल रही है, दुनिया भर में ऐसे कई बड़े टेलीस्कोप मौजूद हैं।
जीएमटी
जीएमटी लगभग 2024 तक अपना काम करना शुरू कर देगा। इस टेलीस्कोप लैब को एंडीज पर्वतमाला में बनाया गया है। इस टेलीस्कोपिक लैब ने हबल स्पेस टेलीस्कोप से 10 गुना बेहतर और साफ तस्वीर देने का दावा किया है।
एटाकामा लॉर्ज मिमी
यह टेलीस्कोप छजंतोर पठार पर 5000 मीटर की ऊंचाई पर नार्थ चिली में स्थित है। एएलएमए एक अंतराष्ट्रीय सहयोग से बनी वैधशाला है, जिसमें यूरोप, यूएस, कनाडा जैसे कई देश सहायक हैं।
एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन
एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की ऑप्टिकल दूरबीन नैनीताल (उत्तराखंड) में है। दूरबीन भवन में एक 17 मीटर व्यास और 35 मीटर ऊंचा शीर्ष से घूमने वाला बेलनाकार गुबंद है, जिसे पूरी तरह से पहली बार भारत में बनाया गया है। इसका कुल वजन लगभग 150 टन है।
ऑरकिबो आब्जर्वेटरी
यह देखने में एक रोलर कोस्टर की तरह दिखती है। यह टेलीस्कोप वैधशाला साल के 365 दिन और चौबीसों घंटे काम करती है। यह वैधशाला चंद्रमा, बुध, शुक्र और कई खगोलीय पिंडो की खोज और डेटा एकत्रित करती है।
यूरोपीयन एक्सट्रीमैली
इस टेलीस्कोप को अंतरिक्ष पर नजर रखने वाली सबसे बड़ी आंख कहा जाता है। इस प्रोजेक्ट की लागत एक बिलियन डॉलर थी। इसका निर्माण 2014 से शुरू हुआ था।