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आतंकियों का खतरनाक पैटर्न: 10 साल तक खामोशी, फिर रची हमले की खौफनाक साजिश; कैसे काम करता हैं स्लीपिंग मॉड्यूल?

Wed, 07 Oct 2026 05:36 PM IST
शिवम गर्ग आईएएनएस, नई दिल्ली।

सार

भारत में कुछ स्व-रेडिकलाइज्ड आतंकी मॉड्यूल वर्षों तक निष्क्रिय रहकर अपनी पहचान छिपाए रखते हैं। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, पुणे का मामला इसी पैटर्न का उदाहरण है। ऐसे नेटवर्क कैसे काम करते हैं और एजेंसियां इन्हें रोकने में कैसे जुटी हैं? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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सांकेतिक तस्वीर (एआई-जनरेटेड ) - फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार
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भारत में स्व-रेडिकलाइज्ड आतंकी मॉड्यूल के काम करने का एक चिंताजनक पैटर्न सामने आया है। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, कुछ मॉड्यूल लंबे समय तक बिल्कुल निष्क्रिय रहते हैं और वर्षों बाद अचानक किसी बड़े आतंकी हमले की कोशिश कर सकते हैं। अधिकारियों को आशंका है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कई मॉड्यूल मौजूद हो सकते हैं, जो लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की नजर से बाहर रहकर अपनी गतिविधियों को अंजाम देने की तैयारी कर रहे हैं।

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वर्षों तक शांत रहना बनाता है खतरनाक
एक अधिकारी ने बताया कि भारत में ऐसे कई मॉड्यूल इस्लामिक स्टेट या अल-कायदा इन द सबकॉन्टिनेंट से प्रभावित पाए गए हैं। अधिकारी के मुताबिक, इनका लंबे समय तक इंतजार करना इन्हें ज्यादा खतरनाक बनाता है। ऐसे मॉड्यूल की शुरुआत आमतौर पर समान कट्टरपंथी विचार रखने वाले एक-दो युवाओं से होती है। इसके बाद वे धीरे-धीरे अपना नेटवर्क बढ़ाने और ऐसे लोगों को जोड़ने की कोशिश करते हैं, जिन्हें वे अपने उद्देश्य के लिए उपयुक्त मानते हैं।

पढ़े-लिखे और नौकरीपेशा युवाओं पर नजर
खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी के मुताबिक, ऐसे नेटवर्क में कई बार अच्छी शिक्षा और ऊंची आय वाली नौकरी करने वाले युवाओं को शामिल किया जाता है। अधिकारी के अनुसार, इसकी एक वजह यह है कि ऐसे लोग आसानी से सुरक्षा एजेंसियों की नजर में नहीं आते। साथ ही उनकी आय से मॉड्यूल की गतिविधियों के लिए पैसा जुटाया जा सकता है और बाहरी फंडिंग पर निर्भरता कम रहती है।
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कुछ मॉड्यूल एक दशक से निष्क्रिय
अधिकारियों के मुताबिक, कुछ मॉड्यूल 2014 के आसपास बनाए गए थे और उनके खिलाफ एक दशक से ज्यादा समय तक किसी बड़ी गतिविधि की जानकारी नहीं मिली। पुणे में पकड़ा गया मॉड्यूल भी इसी तरह काम कर रहा था। इसे 2015 में स्थापित किया गया था। करीब 10 साल तक इसने कोई खुली गतिविधि नहीं की और अपनी गतिविधियों के निशान छिपाए रखे। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मॉड्यूल के सदस्य इस दौरान नए लोगों को प्रभावित करने और अपने नेटवर्क को धीरे-धीरे मजबूत करने में जुटे रह सकते हैं।

'लोन वुल्फ अटैक पर निर्भर नहीं'
एक अन्य अधिकारी ने बताया कि लंबे समय तक निष्क्रिय रहने वाले स्व-निर्भर मॉड्यूल आमतौर पर अकेले किसी व्यक्ति से हमला कराने की रणनीति पर निर्भर नहीं रहते। अधिकारी के अनुसार, अचानक किया गया अकेला हमला न केवल कम प्रभावी हो सकता है, बल्कि इससे पूरा नेटवर्क भी जल्दी सुरक्षा एजेंसियों की नजर में आ सकता है। इसके बजाय ऐसे मॉड्यूल कई वर्षों तक इंतजार कर अपनी तैयारी पूरी करने की कोशिश करते हैं।

स्थानीय समुदाय में घुल-मिलकर रहते हैं
ऐसे नेटवर्क को पकड़ना इसलिए भी मुश्किल होता है क्योंकि इनके सदस्य आम लोगों के बीच सामान्य जीवन जीते हुए अपनी पहचान छिपाए रख सकते हैं। वे लंबे समय तक स्थानीय समुदाय का हिस्सा बनकर रहते हैं और अपनी गतिविधियों को बेहद सीमित रखते हैं। अधिकारियों का कहना है कि इसी वजह से किसी मॉड्यूल की सक्रियता सामने आने में काफी समय लग सकता है।

NIA ने अपनाई सक्रिय रणनीति
अधिकारियों के मुताबिक, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने ऐसे छिपे हुए मॉड्यूल के खिलाफ अपनी रणनीति को और सक्रिय किया है। एजेंसी राज्य की जांच और सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय कर संभावित नेटवर्क को पहले ही तोड़ने की कोशिश कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि अभियान लगातार जारी है और देश के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसे निष्क्रिय मॉड्यूल सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर हैं। जांच एजेंसियों का लक्ष्य केवल मौजूदा नेटवर्क को पकड़ना ही नहीं, बल्कि नए मॉड्यूल बनने से रोकना भी है।

पुणे केस से सामने आया पैटर्न
पुणे का मामला ऐसे निष्क्रिय मॉड्यूल के काम करने का एक उदाहरण बताया जा रहा है। शुरुआती दौर में इस मॉड्यूल की गतिविधियां अल-कायदा की विचारधारा और 'गजवा-ए-हिंद' जैसे कट्टरपंथी नैरेटिव को बढ़ावा देने तक सीमित थीं।

बाद में, जब मॉड्यूल के सदस्यों को लगा कि वे आगे की कार्रवाई के लिए तैयार हैं, तो उन्होंने पुणे के कोंढवा जैसे इलाकों में आईईडी से जुड़े हमलों की दिशा में कदम बढ़ाया। खुफिया आकलन के मुताबिक, आने वाले समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे मॉड्यूल सामने आ सकते हैं। अधिकारियों का कहना है कि इनसे निपटने में खुफिया एजेंसियों की निगरानी और समय रहते नेटवर्क की पहचान करना सबसे अहम होगा।

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