भारत कूटनीतिक मोर्चे पर भी बदलाव लाने के मूड में नहीं है। दक्षिण चीन सागर, हॉन्गकॉन्ग, वन रोड वन बेल्ट परियोजना के प्रति विरोधी रुख जारी रहेगा। भारत कोरोना व अन्य मामलों में चीन को अलग-थलग करने में भूमिका निभाता रहेगा। भारत संदेश देना चाहता है कि वह तनाव पैदा करने की स्थिति में उसके लिए वैश्विक स्तर पर परेशानी पैदा करने के किसी विकल्प को जाने नहीं देगा।
शुरुआत में भारत ने शीर्ष कूटनीतिक पहल नहीं करने की रणनीति बनाई थी। यह संदेश देने की कोशिश की जा रही थी कि भारत दबाव में नहीं है। खुद को सैन्य स्तर तक सीमित रखा। सीमा विवाद समिति को भी बातचीत से अलग रखा। इससे चीन दबाव में आता गया। इस बीच बाह्य मोर्चे पर अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, आस्ट्रेलिया जैसे देशों से घिरने और भारत को घेरने की रणनीति पर जब चीन विफल हुआ तभी भारत ने डोभाल को आगे किया।
दो महीने से तनाव के बावजूद एनएसए डोभाल सामने नहीं आए। हालांकि पर्दे के पीछे कूटनीतिक रणनीति डोभाल ही बना रहे थे। डोभाल ने ही विवाद की शुरुआत में डोकलाम जैसी रणनीति बनाई। इसके तहत चीन को दबाव में लाने की रणनीति डोभाल की ही थी। यही कारण है कि चीन डोकलाम की तरह ही इस बार भी भारत के दबाव में आया।