अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से प्रधानमंत्री की बातचीत ने दुनिया के देशों को नया संदेश दे दिया है। कूटनीति के जानकार भारत-चीन के विवाद में बेहद अहम मोड़ मान रहे हैं। प्रधानमंत्री से पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने अमेरिकी समकक्ष मार्क एस्पर से बात की थी।
लद्दाख में गालवां नाला और पैंगोग त्सो के पास चीन सैनिकों की अच्छी खासी तादाद है। चीनी वायुसेना के विमानों ने भी क्षेत्र में उड़ान भरी है। इसके जवाब में भारत ने भी तोपों की तैनाती समेत कई कदम उठाए हैं।
भारतीय सीमा में चीनी सैनिकों की घुसपैठ कोई कोई पहली घटना नहीं है। दोनों देशों के बीच में तमाम स्थानों पर स्पष्ट सीमा निर्धारण नहीं है। इसके चलते कभी चीन की सेना भारतीय क्षेत्र में तो कभी भारतीय सुरक्षा बल चीन के क्षेत्र में चले जाते थे।
लेकिन फ्लैग मीटिंग्स के बाद दोनों वापस अपने-अपने इलाकों में चले जाते थे। पिछले कुछ सालों से चीन के इस व्यवहार में बदलाव आया है। अब चीन के सैनिक आक्रामक तरीके से घुसपैठ कर रहे हैं।
चीन भारत की सीमा के निकट लगातार अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा रहा है। इसी इरादे से उसने भारतीय सीमा में घुसपैठ की संख्या बढ़ा दी है। पिछले साल 600 से अधिक बार चीनी सेनाओं ने भारतीय सीमा में घुसपैठ की।
2017 में उसके सैनिक भारत-भूटान-चीन के त्रिकोणीय क्षेत्र के पास और भूटान के डोकलाम में आ डटे। लद्दाख में चीनी सेना पत्थर, कंटीली लाठियां आदि लेकर घुसपैठ के इरादे से आई और जम गई है।
इतना ही नहीं चीन पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुलकर साथ दे रहा है। शंघाई सहयोग संगठन में पाकिस्तान की एंट्री भी चीन के दबाव में हुई है। भारत की तमाम आपत्तियों के बाद भी वह पाक अधिकृत कश्मीर में सीपीईसी परियोजना को धार दे रहा है।
भारत को जमीन और समुद्र में चारों तरफ से घेरने की रिंग आफ पर्ल की योजना भी बदस्तूर जारी है।
अमेरिका जी-7 में रूस के दोबारा शामिल होने की इच्छा व्यक्त कर चुका है। राष्ट्रपति ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी को न्यौता दे चुके हैं। रूस के अलावा वह दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया को भी इसमें शामिल करने का पक्षधर हैं।
चीन को अमेरिका की इस तरह की गुटबाजी से जहां चिढ़ है, वहीं रूस ने इस तरह के किसी संगठन में चीन का होना भी जरूरी बताया है। अमेरिका की यह गुटबाजी चीन को अलग-थलग करने के तौर पर देखी जा रही है।
समझा जा रहा है कि चीन अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए कनाडा, इटली का सहयोग लेकर जी-7 का विस्तार टालने की कोशिश कर सकता है। रूस के लिए जी-7 जैसे संगठन में शामिल होना उसकी जरूरत है।
इससे जहां अमेरिका को रूस के खिलाफ प्रतिबंध हटाने पड़ेंगे, वहीं यूरोपीय देशों को भी रुख में बदलाव लाना पड़ेगा। इससे रूस की बड़ी शिकायत दूर हो सकती है। लेकिन इन सब परिस्थितियों के बाद भी रूस के चीन का साथ काफी अहम है।
इस तरह से चीन अमेरिका के विरोध की धीरे-धीरे धुरी बनने की तरफ बढ़ रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि भारत और चीन के बीच में इस तरह का टकराव चलता रहेगा।
चीनी मामलों के जानकार कहते हैं कि चीन के रुख में काफी आक्रामक बदलाव आया है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग समझते हैं कि अब दुनिया के सामने चीन के हितों को खुलकर रखने का समय आ गया है।
उनकी नीति अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति हू जिंताओ से अलग है। वह आक्रामकता में संतुलन बढ़ाकर आगे बढ़ रहे हैं। भारत में चीनी सेनाओं की घुसपैठ भी टैक्टिल मूव को आधार बनाकर हो रही है।
पिछले कुछ सालों से चीन का रवैया देखें तो लगता है कि वह सीमा विवाद नहीं सुलझाना चाहते हैं। दूसरे लगातार बढ़ रही घुसपैठ और आक्रमकता से लगता है कि वह भारत से इस तरह की घटनाओं को बर्दाश्त करने की अपेक्षा रखते हैं।
वायुसेना के पूर्व अध्यक्ष एयरचीफ मार्शल पीवी नाइक कहते हैं कि यह चीन का भ्रम भी हो सकता है। चीन ही नहीं भारत भी बदल रहा है। शक्ति, सामथ्र्य, आर्थिक प्रगति में भी बदलाव हो रहा है।
नाइक कहते हैं कि चीन को 1962 वाले भारत का भ्रम छोड़ देना चाहिए। नाइक कहते हैं कि भारत किसी देश के लिए खतरा नहीं है, लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।