लद्दाख क्षेत्र में चीन ने अपनी करीब 50 हजार की संख्या में सेना तैनात की है। स्थाई बंकर, सैन्य संरचना खड़ी की है। उसके बख्तरबंद वाहनों की काफी बड़ी संख्या तैनात है। सूत्र बताते हैं कि आस-पास के क्षेत्र में करीब 1500 फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर, टैंक, तोप, यूएवी, निगरानी के अन्य उपकरण तैनात हैं।
चीन की यह सैन्य तैनाती सैन्य मामले के जानकारों को हैरान करती है। एक आशंका भी प्रबल है कि क्या चीन किसी बड़ी लंबी तैयारी के साथ युद्ध जैसी मंशा लेकर आया है? इसके लिए चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ द्वारा साल के शुरू में जारी रिपोर्ट की तरफ ध्यान जाता है। इसमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अनुमति के बाद चीन की सेना तिब्बत में युद्धाभ्यास के बहाने आई और युद्धाभ्यास खत्म होने के बाद उसने एलएसी की तरफ फोकस किया है।
हालांकि भारत ने चीन की मंशा को देखकर किसी भी चुनौती से निबटने के लिए अपनी सैन्य तैयारी कर रखी है। भारत चाहता है कि दोनों देशों के बीच में और टकराव, तनाव की नौबत न आए। इसके लिए उच्चस्तर पर सतर्कता बरती जा रही है।
क्या सोच रहे हैं चीन के रणनीतिकार?
इसका जवाब देना पेचीदा है। चीन मामलों के जानकार, पूर्व विदेश सचिव, पूर्व सैन्य अधिकारी और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ इस सवाल पर खुलकर जवाब नहीं देना चाहते। लेकिन समझा जा रहा है कि लद्दाख में सैन्य तैयारी के साथ आना चीन की विस्तार वादी नीति से भरी कुटिल चाल है। इसको लेकर अमेरिकी राजनयिक, विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आशंक सही जान पड़ती है। चीन को पता है कि कोविड-19 जैसी महामारी में भारत जैसे देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हआ है।
चीन इसी का फायदा उठाना चाहता है। उसे लग रहा है भारत पर दबाव डालने, अपनी बात मनवाने का यही समय है। उसके द्वारा युद्ध जैसे हालात पैदा करने, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ करने, कूटनीतिक तरीके से अपने एजेंडे को नया मोड़ देने की कोशिशें इसी का हिस्सा जान पड़ती हैं।
चीन की इस बहाने कोशिश है कि वह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से पाक अधिकृत कश्मीर, अक्साई चिन, लद्दाख होते हुए चीन के प्रांत तक जाने वाली वन-बेल्ट-वन रोड परियोजना को भारत की छाया से पूरी तरह सुरक्षित कर ले। माना जा रहा है कि इसी उद्देश्य को साधने के लिए पाकिस्तान भी उसकी लगातार सहायता कर रहा है।
सीडीएस जनरल विपिन रावत द्वारा हाल में दिए गए वक्तव्य का भी निहितार्थ यही निकाला जा रहा है। हाल में ही सीडीएस जनरल रावत ने कहा था कि भारतीय सैन्य बल पाकिस्तान और चीन दोनों की चुनौतियों से निबटने में सक्षम हैं।
नहीं बनी बात तो आगे उम्मीद पर दुनिया कायम है.....पीएम मोदी हैं
दोनों विदेश मंत्रियों के बीच में ढाई घंटे की मास्को चर्चा का नतीजा कदाचित नहीं निकलता तो अभी तनाव बने रहने के आसार हैं। विदेश मंत्रियों की बातचीत के बाद अब दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों (एनएसए अजीत डोभाल और स्टेट काउंसलर वांग यी) के बीच में तनाव घटाने को लेकर चर्चा हो सकती है। इस चर्चा में ध्यान रखना होगा कि भारत के वार्ताकार बदलेंगे। विदेश मंत्री एस जयशंकर के स्थान पर एनएसए अजीत डोभाल रहेंगे, लेकिन चीन की तरफ से विदेश मंत्री और स्टेट काऊंसलर वांग यी विशेष प्रतिनिधि रहेंगे।
ऐसी भी संभावना है कि भारत और चीन के बीच में लद्दाख का तनाव कम करने के लिए शंघाई सहयोग संगठन(एससीओ) के शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व (प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग) को वार्ता की मेज पर आना पड़े।