सोमवार को जिस गलवां घाटी के पास दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई, वह दुनिया के सबसे मुश्किल युद्ध क्षेत्रों से एक है। झड़प की जगह धरती की सतह से 14,000 फुट ऊपर है। इस इलाके में गर्मी के मौसम में भी तापमान शून्य डिग्री से नीचे रहता है। दिसंबर और जनवरी के महीने में तो गलवां घाटी का तापमान माइनस 20 डिग्री तक पहुंच जाता है।
समय से नहीं मिल सका इलाज, दुर्गम क्षेत्र में लापता जवानों को ढूंढने में हुई देरी
खूनी झड़प में गोलियां नहीं चली। कांटेदार रॉड और पत्थरों से चीनी सेना ने हमला बोला। इसमें कई घायल सैनिकों ने शून्य डिग्री से भी कम तापमान होने और समय पर चिकित्सीय सहायता नहीं मिलने के कारण दम तोड़ा।
दुरूह और दुर्गम क्षेत्र होने के कारण झड़प के दौरान लापता हुए घायल सैनिकों को ढूंढने में देरी हुई। इस कारण भी हताहतों की संख्या बढ़ गई। यही खूनी झड़प अगर मैदानी क्षेत्र में होती तो हताहतों की संख्या इतनी ज्यादा नहीं होती।
इस दुर्गम और दुरूह क्षेत्र में एक खास तरह की अत्याधुनिक किट जवानों की मौसम और तापमान से रक्षा करती है। इस विशेष किट में थर्मल इंसोल, चश्मे, सोने के लिए किट, कुल्हाड़ी, जूते, हिमस्खलन पता लगाने वाले यंत्र और पर्वतारोहण के सामान शामिल होते हैं।
साल 67 में भी हुई थी भीषण झड़प
सोमवार की हिंसक झड़प ने दोनों देशों के बीच 1962 में हुए युद्ध के बाद पांच साल बाद हुए खूनी टकराव की याद दिला दी। तब एलएसी पर इसी तरह दोनों देशों की सेना के बीच खूनी झड़प हुई थी। तब भारत के 80 व चीन के 300 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे।
इस खूनी झड़प में हुए नुकसान पर चीन चुप है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह एलएसी पर भविष्य में ऐसी झड़प नहीं चाहता। इस झड़प के बाद चीनी समाचार पत्र ने मंगलवार को चीनी सैनिकों के नुकसान होने की बात स्वीकारी थी।
इस समाचार पत्र से जुड़े रिपोर्टर ने 27 सैनिकों के हताहत होने संबंधी ट्वीट किया था। मगर बुधवार के संस्करण में ग्लोबल टाइम्स ने इसका उल्लेख नहीं किया। हालांकि सूत्र बताते हैं कि इस झड़प में चीन को भी भारी नुकसान पहुंचा। चीनी सेना का कमांडिंग ऑफिसर सहित 40 जवान मारे गए। एलएसी के दूसरी तरफ बड़ी संख्या में एम्बुलेंस पहुंचने की बात भी सामने आई।