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कायराना हरकत: थर्मल इमेजिंग ड्रोन से भारतीय जवानों की संख्या पता की, फिर ज्यादा सैनिक जुटाकर किया हमला

Thu, 18 Jun 2020 04:59 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, लेह/नई दिल्ली।
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कश्मीर के गांदरबल जिले में श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे तैनात सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवान। - फोटो : PTi
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गलवां घाटी में भारत-चीन की सेना के बीच हिंसक झड़प चीन की सुनियोजित साजिश थी। इलाके में भारतीयों की सही संख्या जानने के लिए चीनी सैनिकों ने थर्मल इमेजिंग ड्रोन का इस्तेमाल किया था। यही कारण था, हमले के दौरान भारतीय सैनिकों की संख्या कम पड़ गई।

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चीनी सैनिकों ने धोखे से पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 पर तब भारत की छोटी टुकड़ी को निशाना बनाया, जब टुकड़ी बस यह जानने गई थी, चीन ने वादे के मुताबिक स्टैंड ऑफ स्थिति से हटे हैं या नहीं। कर्नल संतोष बाबू के नेतृत्व में मौके का मुआयना करने पहुंची टुकड़ी ने देखा कि वादे और सहमति के बावजूद चीनी सेना ने स्टैंड ऑफ स्थिति से हटना तो दूर, वहां टेंट लगा रखा है।



इस पर भारतीय जवानों की चीनी जवानों के बीच कहा-सुनी हुई। ऐसा लगा जैसे चीनी सेना पूरी तैयारी में थी। अचानक मौके पर मौजूद चीनी जवान भारतीय सैनिकों से भिड़ गए। फिर नजदीक के पहाड़ों से भारतीय टुकड़ियों पर पत्थर की बरसात होने लगी। फिर पूर्व तैयारी के साथ डटे चीनी सैनिकों ने कंटीले तारों लगे रॉड और पत्थरों से हमला कर दिया।
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उस दौरान मौके पर भारत की तुलना में चीन के सैनिकों की संख्या पांच गुना ज्यादा थी। सूत्रों के अनुसार, इसके बावजूद भारतीय सैनिक जांबाजी से लड़े। चूंकि, भारत को ऐसे धोखे का अंदाजा नहीं था। चीनी सैनिक मैत्रीपूर्ण इशारे कर रहे थे।

दोनों ओर के सैन्य अफसर हरिंदर सिंह और लिन लिऊ के बीच स्टैंड ऑफ स्थिति से चीनी सैनिकों के पीछे हटने पर सहमति बनी थी। ऐसे में भारतीय सेना को रणनीति व पूर्व तैयारी के साथ ऐसे हमले की उम्मीद नहीं थी। इसीलिए मौके का मुआयना करने भी सेना की छोटी टुकड़ी पहुंची थी।

सूत्रों ने बताया, चूंकि हमला अचानक और पूर्व तैयारी के साथ किया गया, इसलिए भारतीय जवान बुरी तरह से घिर गए। उनके पास चीनियों की तरह कंटीले रॉड वगैरह भी नहीं थे। चीनी सैनिकों की तुलना में पांच गुना कम सैनिक होने के बावजूद मौके पर छह से सात घंटे तक झड़प हुई। अचानक हमले से बुरी तरह घायल भारतीय सैनिक शून्य तापमान के कारण भी बड़ी संख्या में हताहत हुए।

14 हजार फुट की ऊंचाई, शून्य से नीचे तापमान

सोमवार को जिस गलवां घाटी के पास दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई, वह दुनिया के सबसे मुश्किल युद्ध क्षेत्रों से एक है। झड़प की जगह धरती की सतह से 14,000 फुट ऊपर है। इस इलाके में गर्मी के मौसम में भी तापमान शून्य डिग्री से नीचे रहता है। दिसंबर और जनवरी के महीने में तो गलवां घाटी का तापमान माइनस 20 डिग्री तक पहुंच जाता है।

समय से नहीं मिल सका इलाज, दुर्गम क्षेत्र में लापता जवानों को ढूंढने में हुई देरी
खूनी झड़प में गोलियां नहीं चली। कांटेदार रॉड और पत्थरों से चीनी सेना ने हमला बोला। इसमें कई घायल सैनिकों ने शून्य डिग्री से भी कम तापमान होने और समय पर चिकित्सीय सहायता नहीं मिलने के कारण दम तोड़ा।

दुरूह और दुर्गम क्षेत्र होने के कारण झड़प के दौरान लापता हुए घायल सैनिकों को ढूंढने में देरी हुई। इस कारण भी हताहतों की संख्या बढ़ गई। यही खूनी झड़प अगर मैदानी क्षेत्र में होती तो हताहतों की संख्या इतनी ज्यादा नहीं होती।

खास किट बचाती है सैनिकों की जान

इस दुर्गम और दुरूह क्षेत्र में एक खास तरह की अत्याधुनिक किट जवानों की मौसम और तापमान से रक्षा करती है। इस विशेष किट में थर्मल इंसोल, चश्मे, सोने के लिए किट, कुल्हाड़ी, जूते, हिमस्खलन पता लगाने वाले यंत्र और पर्वतारोहण के सामान शामिल होते हैं।

साल 67 में भी हुई थी भीषण झड़प
सोमवार की हिंसक झड़प ने दोनों देशों के बीच 1962 में हुए युद्ध के बाद पांच साल बाद हुए खूनी टकराव की याद दिला दी। तब एलएसी पर इसी तरह दोनों देशों की सेना के बीच खूनी झड़प हुई थी। तब भारत के 80 व चीन के 300 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे।
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नुकसान पर चीन चुप

इस खूनी झड़प में हुए नुकसान पर चीन चुप है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह एलएसी पर भविष्य में ऐसी झड़प नहीं चाहता। इस झड़प के बाद चीनी समाचार पत्र ने मंगलवार को चीनी सैनिकों के नुकसान होने की बात स्वीकारी थी।

इस समाचार पत्र से जुड़े रिपोर्टर ने 27 सैनिकों के हताहत होने संबंधी ट्वीट किया था। मगर बुधवार के संस्करण में ग्लोबल टाइम्स ने इसका उल्लेख नहीं किया। हालांकि सूत्र बताते हैं कि इस झड़प में चीन को भी भारी नुकसान पहुंचा। चीनी सेना का कमांडिंग ऑफिसर सहित 40 जवान मारे गए। एलएसी के दूसरी तरफ बड़ी संख्या में एम्बुलेंस पहुंचने की बात भी सामने आई।
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