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डोकलाम विवाद में पीछे नहीं हट सकता भारत, और सेना भेजने को तैयार

Sun, 16 Jul 2017 08:29 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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indian china
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चीन के साथ भूटान के क्षेत्र डोकलाम  पर चल रहे विवाद में भारत पीछे नहीं हट सकता। गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में विदेश सचिव एस जयशंकर ने इसके सामरिक और रणनीतिक महत्व को बताते हुए  स्थिति स्पष्ट कर दी है।
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विदेश मंत्रालय सूत्रों का कहना है कि भारत अपने इस रूख पर कायम है और डोकलाम से पीछे नहीं हटा जा सकता। वहीं रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि जरूरत पड़ी तो डोकलाम में भारत और सेना भेजने के लिए तैयार है। ऐसे में भारत और चीन के बीच दोकलम पर चल रही तनातनी के कुछ दिन चलने के आसार हैं।

चीन द्वारा कश्मीर में तीसरे देश के हस्तक्षेप की धमकी पर मंत्रालय सूत्रों का कहना है कि इस पर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं है। पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर का भी कहना है कि चीन से कुछ भी बोल देने वाली प्रतिक्रिया आ रही है। ऐसा लग रहा है जैसे उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा है और बदहवासी में कोई भी बयान दे दे रहे हैं।
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क्या होगा दोकलम विवाद का

doklam border
जब तक चीन के सैनिक सड़क निर्माण से पीछे नहीं हटते, भारतीय सैनिक नॉन काम्बैट मोड में डोकलाम में डटे रहेंगे। समझा जा रहा है कि इस दौरान कूटनीतिक प्रयासों के जरिए विवाद के निबटारे तक यथा स्थिति बहाल रखने की शर्त को प्रमुखता दी जाएगी।

बीच के रास्ते के तौर पर भूटान चीन और भारत दोनों से अपनी-अपनी सेनाओं को अपने क्षेत्र में ले जाने के लिए कह सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि ब्रिक्स देशों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जा रहे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की अपने चीनी समकक्ष से चर्चा के बाद इसका हल निकल सकता है।

कहां है भारत
दोकलम भूटान का भूभाग है। भारत ने भूटान को उसके सीमाक्षेत्र की सुरक्षा की गारंटी दे रखी है। मौजूदा समय में भारतीय सेना भूटान के क्षेत्र में दोकलम में जमी हुई है। यह सीमा चीन से लगती है और चीन इसे अपना हिस्सा बताता है। जबकि भूटान का दावा है कि यह क्षेत्र उसका अपना है।

इसको लेकर दोनों देशों में विवाद सुलझने तक यथास्थिति बनाए रखने के लिए 1988 और 1998 में दो बार सोझौता भी हुआ है। इस विवाद को सुलझाने के लिए चीन और भूटान में वार्ता चल रही थी। इस दौरान चीन के सैनिकों ने पिछले साल की तरह इस बार दोकलम में सड़क निर्माण का कार्य शुरू कर दिया।

वे अचानक साजो-सामान लेकर आए और सड़क मार्ग बनाने में जुट गए। भूटान के सैनिकों  ने इसका प्रतिरोध किया, लेकिन सफल नहीं हो पाए। तब उन्होंने भारतीय सेना को इसकू सूचना दी और सेना ने चीन के सैनिकों को निर्माण कार्य करने से रोक दिया है। जून के महीने से ही भारतीय सैनिकों अस्थाई तंबू गाड़कर दोकलम क्षेत्र में डटे हुए हैं।

क्यों नहीं हटेगा भारत

- फोटो : File Photo
डोकलाम भूटान, चीन और भारत के तिराहे (ट्राईजंक्शन) वाला क्षेत्र है। यह क्षेत्र भारत के लिए भी सामरिक दृष्टि से काफी अहम है। इस रास्ते का प्रयोग करके भारत आसानी से तिब्बत में दाखिल हो सकता है। कभी यह सबसे शांत क्षेत्र था। चीन भी इधर ध्यान नहीं दे रहा था और भारत भी।

हिमालयन पठार का यह क्षेत्र चीन के अधिपत्य वाले (स्वायत्तशासी) तिब्बत के चुम्बी वैली से जुड़ता है। चुम्बी वैली के पूर्व में भूटान पश्चिम में सिक्किम है। भौगोलिक दृष्टि से भारत का अंग प्रतीत होती है। यहां से 14 किमी दूर नाथु-लॉ दर्रा है। भारत पर राज करने वाली ब्रिटिश हूकूमत ने कई सालों तक चुम्बी वैली पर कब्जा किया था।

भारत के लिए अहम इसलिए है कि पश्चिम बंगाल राज्य को सिलिगुड़ी के रास्ते पूर्वोत्तर (नार्थ-ईस्ट) के राज्यों से जोडऩे वाले संकरे रास्ते से सटा है। दूसरे भारत को चीन से जोडऩे वाले दोनों दर्रे जेलेप और नाथु लॉ दोनों का एक छोर तिब्बत के चुम्बीवैली में खुलता है। चीन ने नाथु-लॉ दर्रे तक फर्राटेदार सड़क का निर्माण कर लिया है।

ऐसे में इस क्षेत्र में चीन की सीधी धमक और निगरानी भारत के लिए सुरक्षात्मक दृष्टि से बड़ी चिंता का सबब है, क्योंकि युद्ध की स्थिति आने पर चीन की सेनाएं इसके जरिए आसानी से भारत पर आक्रमण कर सकती हैं।

चीन की मंशा

भारत- चीन बॉर्डर की फाइल फोटो
चीन की विस्तारवादी नीति है। इसी इरादे से चीन ने जहां दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप का निर्माण करके इस पर अपना दावा तेज कर दिया है, वहीं फिलिपींस के करीब में स्थित स्पार्टले द्वीप को भी अपना बता रहा है। भारत के अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताने से नहीं चूकता और तवांग तक दावा करता है।

हाल में सिक्कम तक उसने अपने दावे को धार दे दी थी। इस तरह से चीन अपनी ताकत का एहसास करके पड़ोसी देशों के भू-भाग पर अपनी निगाह गड़ाए है। कभी उसने इसी तरह की नीति पर चलते हुए तिब्बत पर कब्जा कर लिया था और आज तिब्बत चीन का स्वयत्तशासी क्षेत्र बनकर रह गया है।

विस्तारवादी नीति के तहत ही चीन लद्दाख क्षेत्र में और अक्साईचिन में भी अपने नजरें गड़ाए रखी है। इसके अलावा चीन की मंशा दुनिया के देशों से सड़क, जल, हवाई से जुड़कर अपना आर्थिक दायरा बढ़ाने की है। इसी मंशा से वह वन बेल्ट वन रोड योजना पर काम कर रहा है।

पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से बीजिंग , न्यू यूरेशियन लैंड ब्रिज, चीन-मंगोलिया-रूस, चीन से सेन्ट्रल एशिया-वेस्टर्न एशिया, बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार रूट जैसी परिकल्पना पर काम कर रहा है। ल्हासा से नेपाल तक अब चीन की आवाजाही सुगम हो  चुकी है।
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रिंग ऑफ पर्ल

चीन बॉर्डर पर तैनात ITBP निगरानी करते हुए
मोतियों का हार। यह चीन की मंशा से जुड़ा है। श्रीलंका के हंबनटोटा से लेकर वह पाकिस्तान के ग्वादर तक फैलकर हिन्द महासागर क्षेत्र में वह भारत के चारों तरफ अपनी पहुंच और पकड़ मजबूत करना चाहता है। इसके लिए बांग्लादेश के चट्गांव में वह बंदरगाह निर्माण में रुचि दिखा चुका है। चीन की इसी योजना को रिंग ऑफ पर्ल कहा जाता है।

क्यों भारत को घेर रहा है चीन
भारत दुनिया की तेजी से तीसरी बढ़ती अर्थव्यवस्था है। चीन के रणनीतिकार जहां मुकाबले में हमेशा अमेरिका को देखते हैं, वहीं उन्हें अपने रास्ते में भारत सबसे बड़ी बाधा नजर आ रहा है। भारत की निति भी अपनी संप्रभुता से किसी तरह का समझौता करने की नहीं रही है। दूसरे दक्षिण एशिया में भारत सबसे बड़ा प्रभावशाली लोकतांत्रिक देश है।

दुनिया भर के देशों से भारत का संबंध है और खासा महत्व रखता है। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर में स्वतंत्र और भयमुक्त आवाजाही का पक्षधर है। भारत चीन को गिटगिट, बालटिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर के भू भाग से सिल्करोड परियोजना को लेकर आपत्ति जताता है। वन रोड, वन बेल्ट की चीन योजना को भारत संप्रभुता पर हमला मानता है। चीन की विस्तारवादी नीति के सामने चुनौती बनकर खड़ा है।

क्यों आक्रामक हो रहा है चीन
चीन की आक्रामकता लगातार बढ़ रही है। वह अब अमेरिका की भी परवाह न के बराबर कर रहा है। चीन ने फिलिपींस समेत तमाम देशों को जहां घुड़की देना तेज किया है, वहीं पिछले कुछ समय से भारत के साथ रह-रहकर आक्रामक रवैय्या अपना रहा है।

इसके बरअक्स पाकिस्तान के साथ अब खुलकर उसका साथ देने की मंशा जताता है।  वैश्विक मामलों के जानकारों के अनुसार सीरिया को लेकर अमेरिका और रूस में ठने वातावरण के दुनिया की पॉवर पालिटिक्स ने नया आकार लिया है। इससे चीन को काफी बल मिला है। बदले हुए इस समीकरण में चीन अपनी मंशा को पूरा करने का सपना पालने लगा है।
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