प्रधानमंत्री इमरान खान चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान आएं। पाकिस्तान में होने वाला सार्क (दक्षेस) शिखर सम्मेलन हो। भले ही इससे पहले इमरान खान को इसके लिए पहले भारत का दौरा करना पड़े। लेकिन कूटनीति के जानकार अभी यह भरोसा नहीं दिला पा रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी क्या पाकिस्तान जाएंगे? क्योंकि सार्क के चार्टर के अनुसार, किसी भी सदस्य देश के राष्ट्राध्यक्ष की अनुपस्थिति में सार्क नहीं हो सकता। सार्क के अन्य सभी सदस्य देशों ने शिखर सम्मेलन होने अथवा न होने की पूरी जिम्मेदारी भारत के ऊपर डाल रखी है। यानी भारत को छोड़कर अभी तक सब सार्क के पाकिस्तान में आयोजन पर तैयार हैं। प्रोफेसर एस डी मुनि ने अमर उजाला से बातचीत में माना कि सार्क के होने का अर्थ है कि भारत और पाकिस्तान के बीच में संवाद, रिश्ते को सुधारने के प्रयास आदि में तेजी आना। लेकिन सबकुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति पर टिका है। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि हाल में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच सिंधु नदी के जल समझौते को लेकर बात हुई है। इसका मतलब है कि धीरे-धीरे रिश्ते मिठास की तरफ बढ़ रहे हैं। लेकिन किसी नतीजे पर पहुंच जाना जल्दबाजी होगी।
25 अगस्त 2014 को भारत की तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह द्विपक्षीय वार्ता के लिए इस्लामाबाद जाने की तैयारी कर रही थी और अचानक भारत ने पाकिस्तानी उच्चायुक्त के पाकिस्तान के उच्चायुक्त से कश्मीर के अलगाववादी भेंट पर नाराजगी जताते हुए वार्ता रद्द करने का पैगाम भेज दिया। इसके बाद 2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में भाग लेने पाकिस्तान गई रिश्तों की बर्फ पिघलनी शुरू हुई। दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री मोदी काबुल से लौटते समय सीधे लाहौर पहुंच गए। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों में गुफ्तगू हुई और 15 जनवरी 2016 को विदेश सचिव स्तरीय वार्ता की तारीख तय हो गई। यह वार्ता तत्कालीन विदेश सचिव एस जयशंकर की अगुआई में होनी थी, लेकिन पांच जनवरी को पाकिस्तान के आतंकियों ने पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर हमला बोल दिया। दोनों देशों के बीच में सौहार्द की गाड़ी एक बार फिर पटरी से उतर गई।
इसके बाद भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की वार्ता नहीं हुई। भारत ने साफ कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद पर काबू नहीं पाता, सीमा पर घुसपैठ नहीं रुकती और आतंकवादियों के विरुद्ध ठोस कार्रवाई नहीं होती, तबतक वार्ता की गुजाइश नहीं है। हालांकि इसके बाद भी दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कई बार दूसरे देश में मिले। नासिर खांन जजुआ और अजीत डोभाल के बीच में बात हुई, लेकिन द्विपक्षीय शांति वार्ता प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। 2016 में भारत ने उड़ी में सैन्य शिविर पर आतंकी हमले के जवाब में नियंत्रण रेखा के उसपार पहली सर्जिकल स्ट्राइक (सैन्य आपरेशन) किया। इस दौरान दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष एससीओ शिखर सम्मेलन समेत कई मंचों पर एक छत के नीचे आए, लेकिन मुंह उत्तर-दक्षिण ही रहे। संवाद नहीं हुआ। 2019 में पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक ऑपरेशन बालाकोट को पूरा किया। इस दौरान दोनों देशों के रिश्ते बड़े तल्ख हो चले थे।
भारतीय विदेश मामलों के जानकार इसे भारत का रणनीतिक सुधार मान रहे हैं। उनका मानना है कि भारत के साथ-साथ पाकिस्तान के हुक्मरानों को भी यह सच्चाई समझ में आने लगी है। एक पूर्व राजनयिक का कहना है कि जनरल बाजवा ने आतंकवाद को लेकर जो बयान दिया है, वह महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान के हुक्मरानों को समझ में आ रहा है कि अपनी जमीन पर आतंकवाद को बढ़ावा देने की उन्हें क्या कीमत चुकानी पड़ रही है। मेजर जनरल अशोक मेहता कहते हैं कि यदि चीन ने पिछले साल लद्दाख में घुसपैठ न किया होता तो हमे यह सच्चाई नहीं समझ में आती। हम मुगालते में मसल पाकिस्तान के साथ पॉवर दिखाते रहते। मेहता कहते हैं कि लद्दाख की घटना ने हमें सिखाया कि चीन और पाकिस्तान दोनों से एक साथ निबट पाना संभव नहीं है। इसलिए पाकिस्तान के साथ रिश्ते ठीक किए जाने चाहिए और चीन को अपना दुश्मन नंबर-1 मानकर उससे भविष्य में आने वाली चुनौती के लिए तैयारी करनी चाहिए। इसलिए अब आगे भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बातचीत या संवाद के स्तर पर ठीक रहेंगे। एसडी मुनि का कहना है कि 2016 में भारत को पाकिस्तान के साथ संवाद का रिश्ता किसी भी कीमत पर बंद नहीं करना चाहिए था। शशांक का भी मानना है कि संवादहीनता की कूटनीति में गुंजाइश कम रहती है। इस मामले में संभलकर चलना चाहिए। विदेश नीति के जानकारों की इस राय का साफ संदेश है कि भारत और पाकिस्तान दोनों को अपने बातचीत के रास्ते बंद नहीं रखने चाहिए।