शांति की यह पहल क्यों?
पाकिस्तान के ऊपर भारत के साथ शांति वार्ता करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव है। अमेरिका ने आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई का दबाव बढ़ाया है और पाकिस्तान को दी जानेवाली आर्थिक सहायता पर लगातार कैंची चला रहा है।
पाकिस्तान और भारत के आपसी रिश्ते हमेशा संवेदनशील रहे हैं। दोनों देशों में चुनाव के बाद नई सरकार के सत्ता में आने के बाद रिश्तों की कूटनीतिक पिच पर नई शुरुआत होती रही है।
भारत में अगले साल लोकसभा के चुनाव प्रस्तावित हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध दोस्ताना रिश्ते, कश्मीर में आतंकवाद, अस्थिर वातावरण भी एक बड़ा मुद्दा है। दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण, सीमापार की आतंकी घुसपैठ का रुकना और शांति न केवल जम्मू-कश्मीर राज्य में शांति को स्थिरता को बढ़ावा देगी, बल्कि देश के आंतरिक चुनाव के लिहाज से भी अहम रहेगा।
भारत और पाकिस्तान दोनों अंतरराष्ट्रीय समुदाय को लगातार बातचीत, शांति प्रक्रिया और रिश्ते में स्थायित्व का प्रयास करने का संदेश देते रहना चाहते हैं। इसी क्रम में 2014 में लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ समेत सभी दक्षेस देशों के शिखर नेताओं को आमंत्रित किया था। वे आए भी थे। प्रधानमंत्री की सलाह पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने हार्ट ऑफ एशिया की बैठक से इतर पाकिस्तान में रिश्तों को पटरी पर लाने की नई नींव रख आई थीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद अन प्रेसीडेंटेड तरीके से सभी प्रोटोकॉल तोड़ते हुए नवाज शरीफ का निमंत्रण कुबूल किया और सीधे उनके पारिवारिक समारोह में पहुंच गए थे। लेकिन पठानकोट वायुसैनिक अड्डे पर आतंकी हमले ने सभी प्रयासों पर पानी फेर दिया।