भारत सरकार परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के आसपास बनाए जाने वाले एक्सक्लूजन जोन (बफर क्षेत्र) का दायरा घटाने की तैयारी कर रही है। इस कदम का मकसद नए रिएक्टरों के विस्तार के लिए अधिक जमीन उपलब्ध कराना और निजी निवेश को आकर्षित करना है। हालांकि, सरकार के इस फैसले को लेकर विपक्षी दलों और स्थानीय लोगों की ओर से विरोध की आशंका भी जताई जा रही है।
मामले से जुड़े तीन अधिकारियों के अनुसार, फिलहाल भारत में सभी परमाणु रिएक्टरों के आसपास कम से कम 1 किलोमीटर का बफर जोन रखा जाता है, जहां किसी भी तरह की आबादी या आर्थिक गतिविधि की अनुमति नहीं होती। भारत सरकार छोटे रिएक्टरों के लिए 500 मीटर का परमाणु बफर जोन, वहीं बड़े परमाणु रिएक्टरों के लिए 700 मीटर का बफर जोन बनाने जा रही है।
यह व्यवस्था रेडिएशन से जुड़े संभावित खतरों को दूर रखने के उद्देश्य से बनाई गई थी। सूत्रों का कहना है कि सरकार अब इस दायरे को कम करने पर विचार कर रही है, ताकि परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण आसान हो सके और भविष्य में रिएक्टर क्षमता बढ़ाने की योजनाओं को गति मिल सके।
सूत्रों के अनुसार, भारत के परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड और परमाणु ऊर्जा विभाग ने इन बफर जोन को कम करने की योजना को मंजूरी दे दी है। यह बदलाव आगामी कुछ महीनों में सामने आने की संभावना है। पिछले साल देश द्वारा परमाणु उत्पादन क्षेत्र को निजी और विदेशी खिलाड़ियों के लिए खोले जाने के बाद यह कदम उठाया जा रहा है। भारत का लक्ष्य स्वच्छ ऊर्जा रणनीति के तहत 2047 तक परमाणु क्षमता को वर्तमान लगभग 8 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट करना है।
बफर जोन में कमी से बड़े रिएक्टरों के लिए भूमि की आवश्यकता आधी और छोटे रिएक्टरों के लिए लगभग दो-तिहाई तक कम हो सकती है। इससे मौजूदा स्थलों पर दो से तीन गुना अधिक क्षमता स्थापित की जा सकेगी। एक आंतरिक प्रस्तुति के अनुसार, छोटे वर्जित क्षेत्रों के साथ, 700 मेगावाट क्षमता वाले 10-रिएक्टर वाले परमाणु परिसर को 700 हेक्टेयर से कम भूमि में स्थापित किया जा सकता है, जबकि मौजूदा परमाणु संयंत्र लगभग 1,000 हेक्टेयर भूमि का उपयोग करते हैं। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों को औद्योगिक क्षेत्रों में भी स्थापित किया जा सकता है।
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