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150 साल पहले लिखा गीत कैसे बना आजादी की आवाज: लाल किले पर अब गूंजे सभी छह छंद, क्या है वंदे मातरम की कहानी?

Sat, 15 Aug 2026 08:15 AM IST
राकेश कुमार स्पेशल डेस्क, अमर उजाला।

सार

1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की कलम से निकला ‘वंदे मातरम’ कैसे अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई का जयघोष बना, 1937 में इसके दो छंद ही राष्ट्रीय आयोजनों तक क्यों सीमित हुए और 1950 में इसे राष्ट्रगीत का दर्जा कैसे मिला? 150 साल के इस सफर में गीत ने कई दौर देखे। अब 2026 में पूरे छह छंद फिर चर्चा में हैं। जानिए वंदे मातरम की पूरी कहानी, विवाद और बदलता सफर...
 
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वंदे मातरम - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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वंदे मातरम...
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करीब 150 साल पहले लिखे गए इन दो शब्दों ने भारत की आजादी की लड़ाई में ऐसा रंग भरा कि यह गीत धीरे-धीरे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की पहचान बन गया। जुलूस निकले तो वंदे मातरम के नारे लगे। आंदोलन हुए तो इसकी आवाज सुनाई दी। अंग्रेजों ने इसे रोकने की कोशिश की तो आंदोलनकारियों ने और जोर से गाया। आजादी के बाद इसे राष्ट्रगान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला। हालांकि, पूरे गीत के कुछ हिस्सों को लेकर विवाद भी रहा। इसी वजह से सार्वजनिक और राजनीतिक कार्यक्रमों में लंबे समय तक इसके शुरुआती दो छंद ही इस्तेमाल किए जाते रहे।



अब 2026 में वंदे मातरम फिर चर्चा में है। केंद्र सरकार ने इसी साल फरवरी में पहली बार राष्ट्रीय गीत के लिए विस्तृत आधिकारिक प्रोटोकॉल जारी किया। इसके मुताबिक, जब राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान दोनों किसी कार्यक्रम में गाए या बजाए जाएंगे, तो पहले वंदे मातरम और उसके बाद जन गण मन होगा। आधिकारिक छह-छंद वाले संस्करण की अवधि करीब 3 मिनट 10 सेकंड है। इसे आधिकारिक मौकों पर बजाने या गाने के दौरान सभा को सावधान की मुद्रा में खड़े रहने को कहा गया है। 
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इतना ही नहीं, हाल ही में समाप्त हुए मानसून सत्र के दौरान सरकार ने राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में बदलाव किया है। संसद से ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल चुकी है। अब वंदे मातरम को राष्ट्रीय गान के साथ कानूनी संरक्षण मिला है। जानबूझकर इसके गायन को रोकने या इसमें बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

26 मार्च 2026 से आकाशवाणी ने भी अपने सुबह के प्रसारण में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे करीब 65 सेकंड के दो-छंद वाले संस्करण की जगह छह-छंद वाला 3 मिनट 10 सेकंड का संस्करण प्रसारित करना शुरू किया। और अब 15 अगस्त 2026 को पहली बार लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस समारोह में वंदे मातरम राष्ट्रगान से पहले गाया गया। 

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वंदे मातरम का इतिहास क्या है? इसे किसने लिखा? यह अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की आवाज कैसे बना? इसके आखिरी चार छंदों को लेकर विवाद क्या था? 1937 में कांग्रेस ने क्या फैसला लिया था? 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कैसे मिला? और अब 2026 में पूरे छह छंद फिर से आधिकारिक रूप से क्यों इस्तेमाल किए जा रहे हैं? आइए, पूरी कहानी आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं...

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वंदे मातरम लिखा कब गया?
वंदे मातरम के रचयिता बंगाल के महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय थे। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इसकी रचना सात नवंबर 1875 को हुई और पहली बार इसे साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित किया गया। बाद में बंकिम चंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंद मठ में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि वंदे मातरम पहली बार 1882 में लिखा गया था। 1875 में इसकी रचना और शुरुआती प्रकाशन हुआ, जबकि 1882 में यह आनंद मठ का हिस्सा बना।

‘वंदे मातरम’ का सरल अर्थ है- मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।

यहां मां से आशय मातृभूमि से है। आनंदमठ की कहानी संन्यासियों के एक समूह के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें ‘संतान’ कहा गया है। ये लोग अपनी मातृभूमि के लिए जीवन समर्पित करते हैं। इसी कहानी में वंदे मातरम गीत आता है। गीत में मातृभूमि को मां के रूप में देखा गया है और उसकी धरती, हरियाली, पानी, फसल और सुंदरता का वर्णन किया गया है।



1896 में पहली बार कांग्रेस के मंच पर गूंजा वंदे मातरम
वंदे मातरम को राष्ट्रीय आंदोलन में बड़ी पहचान 1896 में मिली। कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यहां रवींद्रनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम गाया। यही वह समय था जब यह गीत साहित्य की दुनिया से निकलकर देश के राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा बनने लगा। इसके बाद कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रमों में भी वंदे मातरम की मौजूदगी बढ़ती गई।

1905 में वंदे मातरम नारे में बदल गया
वंदे मातरम की कहानी में 1905 सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में से एक है। अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया। इसके खिलाफ पूरे बंगाल में आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी सामान के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का अभियान चलने लगा। सात अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर निकले एक बड़े जुलूस में हजारों छात्रों ने वंदे मातरम और दूसरे नारे लगाए। इसी मौके पर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का प्रस्ताव भी पारित हुआ। सरकारी रिकॉर्ड इसे वंदे मातरम के राजनीतिक नारे के रूप में शुरुआती बड़े इस्तेमालों में गिनता है। यहीं से वंदे मातरम सिर्फ गीत नहीं रहा। यह अंग्रेजों के खिलाफ विरोध का नारा भी बन गया। उसी साल कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में इसे अखिल भारतीय राष्ट्रीय आयोजनों के गीत के रूप में स्वीकार किया गया।

अक्टूबर 1905: बना 'वंदे मातरम संप्रदाय'
वंदे मातरम की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी। अक्टूबर 1905 में उत्तरी कलकत्ता में 'वंदे मातरम संप्रदाय' नाम से एक समूह बनाया गया। इसके सदस्य हर रविवार प्रभात फेरियां निकालते और वंदे मातरम गाते थे। वे मातृभूमि के समर्थन में लोगों से स्वैच्छिक दान भी लेते थे। इन प्रभात फेरियों में कभी-कभी रवींद्रनाथ ठाकुर भी शामिल होते थे। यानी गीत अब किताब और कांग्रेस के मंच से आगे निकलकर आम लोगों के बीच पहुंच चुका था।

अंग्रेजों ने वंदे मातरम पर सख्ती क्यों की?
ब्रिटिश सरकार को धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि वंदे मातरम लोगों को आंदोलन से जोड़ रहा है। इसीलिए इसे रोकने की कोशिश शुरू हुई। नवंबर 1905 में बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों पर पांच-पांच रुपये का जुर्माना लगाया गया। उन पर वंदे मातरम का जाप करने का आरोप था। पूर्वी बंगाल में स्कूल-कॉलेजों में वंदे मातरम गाने या इसका नारा लगाने पर रोक लगाने वाले आदेश भी जारी किए गए। लेकिन इसका असर उल्टा हुआ। जिस गीत को रोकने की कोशिश की गई, उसकी आवाज और दूर तक पहुंचने लगी।

1906: बारीसाल में 10 हजार से ज्यादा लोगों का जुलूस
अप्रैल 1906 में बारीसाल में बंगाल प्रांतीय सम्मेलन के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से वंदे मातरम के नारे लगाने पर रोक लगा दी। सम्मेलन को भी रोक दिया गया। इसके बावजूद प्रतिनिधियों ने नारे लगाना जारी रखा और पुलिस की कार्रवाई का सामना किया। इसके बाद 20 मई 1906 को बारीसाल में 10 हजार से ज्यादा लोगों ने वंदे मातरम के झंडे लेकर जुलूस निकाला। खास बात यह थी कि इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के लोग शामिल थे। यह घटना बताती है कि शुरुआती दौर में वंदे मातरम को लेकर आंदोलन में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी भी थी।

1907-08: देश के दूसरे हिस्सों में भी गूंज
वंदे मातरम का असर बंगाल तक सीमित नहीं रहा। 1907 में लाहौर में युवाओं के प्रदर्शनों में इसके नारे लगे। 1908 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन में मजदूर आंदोलन के दौरान भी वंदे मातरम के नारे सुनाई दिए। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के मुकदमे के दौरान मुंबई में भी बड़ी संख्या में लोगों ने वंदे मातरम गाकर उनके प्रति समर्थन जताया। यानी बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में वंदे मातरम देश के अलग-अलग हिस्सों में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बन चुका था।
 

पूरे वंदे मातरम में विवाद क्या था?
यहीं से वंदे मातरम की कहानी का सबसे संवेदनशील अध्याय शुरू होता है। वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों में मातृभूमि की सुंदरता, हरियाली, पानी, फसल और मां के रूप में देश की तस्वीर दिखाई गई है। लेकिन बाद के छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक प्रतीकों का जिक्र आता है। यही हिस्से बाद में विवाद का कारण बने। कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने इन हिस्सों पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि सार्वजनिक राष्ट्रीय गीत में ऐसे धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल सभी समुदायों के लिए सहज नहीं होगा। यह विवाद उस समय और बढ़ा जब 1930 के दशक में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि स्वतंत्रता आंदोलन को ज्यादा से ज्यादा समुदायों को साथ लेकर कैसे चलाया जाए।

कब-क्यों हटाए गए वंदे मातरम के छंद, इस पर विवाद क्या है?
1930 के दशक में जब मोहम्मद अली जिन्ना की धर्म आधारित राजनीति उभार पर थी, तब वंदे मातरम का विरोध शुरू हो गया। खासकर वंदे मातरम के आखिरी चार छंदों को धार्मिक बताकर मुस्लिमों ने इसका विरोध किया। यह वही समय था, जब जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के अलग अधिकारों की वकालत की थी। बताया जाता है कि कांग्रेस ने अपने स्वतंत्रता आंदोलन को एकजुट रखने के लिए वंदे मातरम के सिर्फ दो ही छंदों के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया। 1937 के फैजाबाद अधिवेशन में सीडब्ल्यूसी ने इससे जुड़ा प्रस्ताव पेश किया और कहा कि वंदे मातरम के जो दो छंद सबसे ज्यादा गाए जाते हैं, उन्हें ही राष्ट्रीय आयोजनों में आगे गाया जाएगा। 

2003 में प्रकाशित हुई किताब वंदे मातरम: द बायोग्राफी ऑफ अ सॉन्ग लिखने वाले सब्यसाची भट्टाचार्य के मुताबिक, 1937 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली एक समिति के मार्गदर्शन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कविता के उन हिस्सों को हटाने का फैसला किया, जिनमें खुले तौर पर मूर्ति पूजा वाले संदर्भ थे। इसी प्रारूप को बाद में संविधान सभा ने भी स्वीकार किया था।



1950 में जन गण मन बना राष्ट्रगान, वंदे मातरम को मिला राष्ट्रीय गीत का दर्जा
देश आजाद हो चुका था। अब सवाल था कि आजाद भारत के राष्ट्रीय प्रतीक क्या होंगे। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में इस पर फैसला हुआ। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले वंदे मातरम को जन गण मन के बराबर सम्मान और दर्जा दिया जाएगा। इस घोषणा के बाद संविधान सभा में तालियां बजीं। इस तरह भारत के दो अलग राष्ट्रीय प्रतीक सामने आए-

राष्ट्रगान- जन गण मन

राष्ट्रीय गीत-वंदे मातरम

क्या वंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाया जा सकता था? 
यह सवाल भी अक्सर पूछा जाता है। वंदे मातरम आजादी के आंदोलन में बेहद लोकप्रिय था। लेकिन संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगान के बजाय राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। राष्ट्रगान के तौर पर जन गण मन को स्वीकार किया गया। वंदे मातरम को भी कम महत्व नहीं दिया गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया कि इसे जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा। इसलिए दोनों की भूमिका अलग है, लेकिन राष्ट्रीय महत्व दोनों का बहुत बड़ा है।
 
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2026 में पहली बार वंदे मातरम के लिए आधिकारिक प्रोटोकॉल
अब आते हैं मौजूदा विवाद पर। फरवरी 2026 को गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय गीत के लिए पहली बार विस्तृत आधिकारिक दिशा-निर्देश जारी किए। इसमें कई बातें स्पष्ट की गईं। जब वंदे मातरम और जन गण मन दोनों होंगे तो पहले क्या बजेगा? गृह मंत्रालय ने साफ किया कि पहले वंदे मातरम होगा। इसके बाद जन गण मन होगा। यानी अब दोनों साथ बजाए जाने वाले आधिकारिक कार्यक्रम में क्रम तय कर दिया गया है।

अब तक सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में आमतौर पर वंदे मातरम के शुरुआती दो छंद ही गाए जाते थे। आकाशवाणी भी आजादी के बाद से अपने सुबह के प्रसारण में करीब 65 सेकंड वाले दो-छंद संस्करण का इस्तेमाल करती रही थी। लेकिन 28 जनवरी 2026 की नई गाइडलाइन के बाद छह छंद वाला आधिकारिक संस्करण तय किया गया। इसकी अवधि करीब 3 मिनट 10 सेकंड है। यही वे चार छंद हैं जिनमें धार्मिक प्रतीकों के संदर्भ आते हैं और जिनके सार्वजनिक इस्तेमाल को लेकर 1937 में बहस हुई थी।

किन मौकों पर वंदे मातरम गाया-बजाया जाएगा?
गृह मंत्रालय के प्रोटोकॉल में राष्ट्रीय गीत के इस्तेमाल के लिए कई आधिकारिक मौके बताए गए हैं। इनमें राष्ट्रीय ध्वज फहराने के कार्यक्रम, राष्ट्रपति के किसी सरकारी या सार्वजनिक कार्यक्रम में पहुंचने जैसे अवसर और दूसरे औपचारिक समारोह शामिल हैं। जब आधिकारिक संस्करण बजाया या गाया जाएगा तो सभा में मौजूद लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़े रहने के निर्देश हैं। हालांकि, अगर किसी समाचार फिल्म या वृत्तचित्र में वंदे मातरम का हिस्सा फिल्म के भीतर बज रहा हो तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की गई है, क्योंकि इससे फिल्म की प्रस्तुति बाधित हो सकती है।

पूरे वंदे मातरम में क्या है?
वंदे मातरम मूल रूप से छह छंदों वाला गीत है। पहले दो छंदों में मातृभूमि की प्रकृति और सुंदरता का वर्णन है। तीसरे और चौथे छंद में देश की शक्ति, लोगों और मातृभूमि के प्रति समर्पण की बात आती है। पांचवें छंद में देश को दुर्गा, कमला और वाणी जैसे धार्मिक प्रतीकों से जोड़ा गया है। छठे छंद में मातृभूमि के स्वरूप, उसकी सुंदरता और उसकी रक्षा की भावना को सामने रखा गया है। यानी पूरे गीत में देश की धरती, उसकी शक्ति, समृद्धि, ज्ञान, भक्ति और मातृभूमि के प्रति समर्पण अलग-अलग रूपों में सामने आता है। यही वजह है कि पूरे गीत को समझने के लिए केवल शुरुआती दो छंद पढ़ना पर्याप्त नहीं है। पूरे छह छंदों को देखने पर बंकिम चंद्र की मूल रचना का व्यापक स्वरूप सामने आता है।

1937 और 2026 में क्या फर्क है?
1937 में कांग्रेस ने सार्वजनिक राष्ट्रीय आयोजनों के लिए शुरुआती दो छंदों को प्राथमिकता दी थी। इसके पीछे धार्मिक संदर्भों को लेकर उठी आपत्तियां और राष्ट्रीय आंदोलन में व्यापक स्वीकार्यता की चिंता थी। 2026 में केंद्र सरकार ने छह छंद वाले पूरे आधिकारिक संस्करण के लिए प्रोटोकॉल तय किया है। इसका मतलब यह नहीं है कि 1937 में हटाए गए चार छंद पहली बार लिखे जा रहे हैं। वे मूल वंदे मातरम का हिस्सा पहले से हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि लंबे समय से आधिकारिक और सार्वजनिक आयोजनों में मुख्य रूप से पहले दो छंदों का इस्तेमाल होता रहा, जबकि अब गृह मंत्रालय ने आधिकारिक समारोहों के लिए पूरे छह छंद वाला संस्करण निर्धारित किया है।

वंदे मातरम की पूरी टाइमलाइन
  • 1875- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम की रचना की और यह बंगदर्शन में प्रकाशित हुआ।
  • 1882 - इसे आनंदमठ उपन्यास में शामिल किया गया।
  • 1896 - रवींद्रनाथ ठाकुर ने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे गाया।
  • 7 अगस्त 1905 - कलकत्ता में राजनीतिक नारे के रूप में वंदे मातरम की बड़ी गूंज सुनाई दी।
  • 1905 - बंगाल विभाजन के खिलाफ स्वदेशी आंदोलन में वंदे मातरम बड़ी आवाज बना।
  • 20 मई 1906 - बारीसाल में 10 हजार से ज्यादा लोगों का वंदे मातरम जुलूस निकला।
  • 1937 - कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय आयोजनों में शुरुआती दो छंदों के इस्तेमाल को स्वीकार किया।
  • 24 जनवरी 1950 - संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में समान सम्मान देने का फैसला किया।
  • 7 नवंबर 2025 -वंदे मातरम की रचना के 150 साल पूरे हुए और सालभर चलने वाले राष्ट्रीय कार्यक्रम की शुरुआत हुई।
  • फरवरी 2026 - गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय गीत के लिए पहली बार विस्तृत आधिकारिक प्रोटोकॉल जारी किया।
  • 26 मार्च 2026 - आकाशवाणी ने छह छंद वाला 3 मिनट 10 सेकंड का संस्करण प्रसारित करना शुरू किया।
  • 15 अगस्त 2026 - लाल किले पर पहली बार स्वतंत्रता दिवस समारोह में वंदे मातरम राष्ट्रगान से पहले गाया गया।

राष्ट्रीय गीत- वंदे मातरम

वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलाम्
मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलाम्
मातरम्।

शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्

सप्तकोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
द्विसप्तकोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले।
बहुबलधारिणीं
नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं
मातरम् 

तुमि विद्या, तुमि धर्म
तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वम् हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम्
अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलाम्
मातरम् 

वन्दे मातरम्
श्यामलाम् सरलाम्
सुस्मिताम् भूषिताम्
धरणीं भरणीं
मातरम् 

 
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