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स्वतंत्रता दिवस विशेष: आजादी के बाद... मेरा गांव ही मेरा देश

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Sat, 15 Aug 2020 05:26 AM IST
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भारतीय किसान (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

आजादी के बाद गांव हमारे दिल और दिमाग के दायरे से बाहर होते जा रहे थे, लेकिन एक बार फिर हम गांवों की ओर लौट रहे हैं। यह लौटना आजादी की राह में सबसे बड़ा कदम है, जिसे कोरोना के इस कठिन वक्त में हम सब ने महसूस किया है।



भारत को गांवों का देश कहा गया और कृषि को उसकी रीढ़, जो आधी से ज्यादा आबादी को आजीविका मुहैया कराती है। देश के आधे से ज्यादा लुघ और कुटीर उद्योग की जड़ें भी गांवों में हैं। महात्मा गांधी कहते थे कि भारत को जानना है तो गांवों को जानना पड़ेगा और स्वराज का सपना इन्हीं गांवों से पूरा होगा।


ये गांव ही थे, जिन्होंने आजादी के बाद कई वर्षों तक आयातित अनाज पर जीते देश को आत्मनिर्भर बनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जब आत्मनिर्भर होने का संकल्प दिया तो उन्होंने इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका गांवों की बताई। वैश्वीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते उपेक्षित हुई कृषि का आज भी देश की जीडीपी में 18 फीसदी योगदान है।


देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाने से लेकर कोरोनाकाल तक गांव और खेती ने देश को संकटों से बचाया है। मार्च में लॉकडाउन के बाद कारखाने और उद्योग बंद हो गए थे, तब खेती और गांव ने ही लाखों श्रमिकों को राहत देने का रास्ता खोला। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा संकट में खेती देश की जीवनरेखा बनकर उभरी है तो गांव फिर से आर्थिक मॉडल के केंद्र में हैं।


गांवों की आजादी देखकर हैरान थे अंग्रेज

अंग्रेजी शासन के दौरान गवर्नर जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ ने अपने हुक्मरान को भेजे खत में लिखा था कि भारत के गांव अपने आप में छोटे-छोटे गणराज्य हैं, जो अपनी जरूरी सामग्री की व्यवस्था खुद कर लेते हैं। ग्रामीण व्यवस्था देखकर अंग्रेज वाकई हैरान थे। असल में गांव शहरों के लिए हमेशा अन्नदाता की भूमिका में रहे, लेकिन आर्थिक मॉडलों के तहत उन्हें शहरों पर निर्भर कर दिया गया। यही कारण है कि ग्रामीण व्यवस्था की आत्मनिर्भरता कमजोर हुई।


कोरोनाकाल में फिर केंद्र में गांव

यह फिर साबित हुआ कि ग्रामीणों को शहरों में लाने वाला आर्थिक मॉडल ज्यादा व्यावहारिक नहीं है। असल में देश की भलाई ग्रामों को लघु उद्योगों और खेती आधारित आजीविका से आत्मनिर्भर बनाने में निहित है। अब तक गांव के लोगों को कृषि से निकालकर शहरी मजदूर बनाने पर जोर रहा।


कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि कोरोनाकाल में नजर आ गया है कि अर्थव्यवस्था को कृषि ही टिकाऊ और दबाव मुक्त बना सकती है। सरकार को भी इस बात का अंदाजा हो गया है। इसी से कृषि और संबंधित क्षेत्रों को 1.65 लाख करोड़ रुपये की राहत दी गई है।
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आठ करोड़ लोगों ने किया अपनी माटी का रुख

1996 में विश्व बैंक ने कहा था कि भारत में 20 साल में गांव से शहरों की ओर आने वाले लोगों की तादाद इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी की आबादी से भी दोगुनी होगी। इस लिहाज से भारत में 40 करोड़ लोगों ने शहरों का रुख किया। तमाम सरकारों ने इस बात को नजरअंदाज किया कि ये लोग कृषि अर्थव्यस्था के लिए पूंजी थे।


गांवों से आकर ये लोग शहरों में मजदूर बन गए और जब अवसर खत्म हुए तो फिर गांव का ही रुख करना पड़ा। लॉकडाउन के दौरान भी यही हुआ। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि करीब आठ करोड़ श्रमिक और कामगारों ने गांवों का रुख किया है।


खेती पर जीडीपी का 0.4 फीसदी खर्च, फिर भी देश की रीढ़

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, आत्मनिर्भर अभियान गांवों से ही परिपूर्ण हो सकता है। आज 60 करोड़ से ज्यादा लोग खेती और ग्रामीण उद्योग से जुड़े हैं, लेकिन इसकी तुलना में खेती पर सरकारी खर्च बहुत कम है। आरबीआई के अनुसार, 2011-12 से 2017-18 के दौरान जीडीपी का 0.4 फीसदी ही कृषि पर खर्च हुआ है।


अगर किसानों के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा तो स्वतः मांग पैदा होगी, जो ग्रामीणों को शहर में लाए बिना अर्थव्यवस्था को संबल देगी। जानकारों का कहना है कि देश के 50 फीसदी कुटीर उद्योग गांवों में हैं। कॉटेज और हैंडीक्राफ्ट उद्योगों को राहत पैकेजों के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने का अवसर है।

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