ये पाकिस्तान में भेजे गए खतों की कहानी है जिसमें भारत और पाकिस्तान के दो छात्रों ने अपनी जिंदगी और वहां की संस्कृति के बारे में एक-दूसरे को खत लिखे। एक भारतीय गैर-सरकारी संस्थान 'रूट्स टू रूट्स' के जरिए छात्रों के बीच खतों का ये सिलसिला साल 2010 में शुरू हुआ था लेकिन 2017 की एक घटना के कारण ये रोकना पड़ा।
मुंबई के रहने वाले ऋषिकेश की सबसे बड़ी दौलत उनके दोस्त की भेजी गईं 4 चिट्ठियां हैं। ये खत उन्हें पाकिस्तान में रहने वाले एक दोस्त समीउल्लाह ने भेजे हैं। ऋषिकेश मुंबई में अनुयोग विद्यालय में पढ़ते हैं। वो अपने इस दोस्त से एक साल पहले मिले थे। वहीं, समीउल्लाह लाहौर ग्राम स्कूल में पढ़ते हैं।
वो दोनों दोस्त बन गए और अपनी इस दोस्ती को जिंदा रखने के लिए उन्होंने कलम का सहारा लिया। एक ऐसा तरीका जो किसी सीमा में नहीं बंधा है।
ऋषिकेश ने पहले खत में अपने बारे में बताया। समीउल्लाह ने उसका जवाब दिया। दोनों ही अपने बारे में, अपने परिवार, पसंदीदा खाना और खेल के बारे में बात करते। इस तरह धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती आगे बढ़ती चलती गई। दोनों ने अपने आसपास की जगहों पर भी बात की और तस्वीरें साझा कीं। ऋषिकेश ने गेटवे ऑफ इंडिया, आसपास के मंदिरों और मुंबई के बारे में बताया और तस्वीरें भेजीं।
इसके बाद समीउल्लाह ने उन्हें लाहौर के किले और बादशाह मस्जिद के बारे में बताया और फैज अहमद फैज के काम का भी जिक्र किया। दोनों ने एक-दूसरे से कई तरह के सवाल पूछे। इसमें 'क्या पाकिस्तान में वड़ा-पाव मिलता है?' सवालों की सूची में 'क्या हॉकी तुम्हारा भी राष्ट्रीय खेल है?' जैसे सवाल भी शामिल थे।
जब आई मिलने की बारी
ऋषिकेश और समीउल्लाह के बीच इन खतों की शुरुआत साल 2016 में हुई थी और 2017 में ऋषिकेश ने अपने दोस्त से मिलने का फैसला किया। वह इसके लिए लाहौर जाने वाले थे। ऋषिकेश अपने दोस्त से मिलने के लिए बेहद उत्सुक थे। वह अपने दोस्त के शहर लाहौर को देखना चाहते थे और वहां संस्कृति और इतिहास को जानना चाहते थे।
समीउल्लाह ने अपने चौथे खत में ऋषिकेश से पूछा था, "तु मुंबई से मेरे लिए क्या लेकर आओगे?" इस पर ऋषिकेश ने अपने पिता से पूछा तो उन्होंने दोनों के लिए कपड़े लेने का सुझाव दिया। इसके लिए पास के ही दर्जी से दोनों दोस्तों के लिए पठानी सूट सिलवाए गए।
पासपोर्ट बना लिया गया और वीज़ा की प्रक्रिया भी पूरी हो गई। सारी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद टिकट बुक हो गईं। अब दोनों ही दोस्तों को एक-दूसरे से मिलने का इंतज़ार था। लेकिन, अफसोस ऐसा हो नहीं सका। सारी तैयारियां रखी रह गईं और कई चीजें कैंसिल करनी पड़ीं।
अपने दोस्त से मिलने और उसके देश को देखने का ऋषिकेश का सपना अधूरा रह गया। ऋषिकेश की तरह 'एक्सचेंज फॉर चेंज' कार्यक्रम के तहत 212 स्कूल के बच्चों ने सीमा पार अपने दोस्तों को खत लिखे। इस तरह एक साल में 1000 से ज़्यादा खत एक-दूसरे को भेजे गए।
इनके जरिए बच्चों को पड़ोसी देश की वो छवि जानने को मिली वो बंटवारे की यादों और इतिहास की किताबों से अलग थी। अनुयोग स्कूल की अध्यापक मनीषा गावड़े ने इस कार्यक्रम के बारे में और भी बातें बताईं।
उन्होंने कहा, ''इन खतों के लिए हमने अंग्रेजी भाषा का चुनाव किया। हालांकि, दोनों देशों के बीच हिंदी भाषा इस्तेमाल होती है लेकिन भारत में हिंदी और पाकिस्तान में उर्दू स्क्रिप्ट का इस्तेमाल होता है। इन बच्चों के लिए खुद खत लिखने आसान नहीं थे इसलिए हमारे शिक्षकों ने उनकी मदद की। बच्चे खत लिखने और अपने सवाल पूछने के लिए बहुत उतावले रहते थे और जब खत चले जाते थे तो बेसब्री से जवाब का इंतज़ार करते थे।''