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Independence Day 2024: आजादी के लिए गांधी जी के चलाए पांच आंदोलन, जिन्होंने हिन्दुस्तान की बदली तस्वीर

Thu, 15 Aug 2024 05:40 AM IST
शिवेंद्र तिवारी स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

Independence Day 2024: गांधी आंदोलनों को आज भी याद किया जाता है। सत्य और अहिंसा के प्रति उनके अनूठे प्रयोग उन्हें दुनिया का सबसे अनूठा व्यक्ति साबित करते हैं। हम आपको गांधी के उन पांच आंदोलनों के बारे में बताएंगे जिन्होंने अंग्रेजों को हिन्दुस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
 
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गांधी जी के चलाए आंदोलन - फोटो : AMAR UJALA
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विस्तार
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इस स्वतंत्रता दिवस पर देश की आजादी को 77 साल पूरे हो गए हैं। देश की आजादी में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपना योगदान दिया है। तिलक से नेहरू तक, लक्ष्मी बाई से भगत सिंह तक, सभी ने आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाया। राष्ट्रपति महात्मा गांधी के आंदलनों को कौन भूल सकता है। गांधी आंदोलनों को आज भी याद किया जाता है। सत्य और अहिंसा के प्रति उनके अनूठे प्रयोग उन्हें दुनिया का सबसे अनूठा व्यक्ति साबित करते हैं। हम आपको गांधी के उन पाच आंदोलनों के बारे में बताएंगे जिन्होंने अंग्रेजों को हिन्दुस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया। 
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चंपारण सत्याग्रह
यह सत्याग्रह भारत का पहला नागरिक अवज्ञा आंदोलन था जो बिहार के चंपारण जिले से महात्मा गांधी की अगुवाई में 1917 को शुरू हुआ था। इस आंदोलन के माध्यम से गांधी ने लोगों में जन्मे विरोध को सत्याग्रह के माध्यम से लागू करने का पहला प्रयास किया जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आम जनता के अहिंसक प्रतिरोध पर आधारित था।

असहयोग आंदोलन
अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला हत्याकांड के बाद देश में गुस्सा था। अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। अंग्रोजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ स्वराज की मांग उठनी शुरू हुई। एक अगस्त, 1920 को महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की घोषणा की गई। छात्रों ने स्कूल-कॉलेज जाना बंद कर दिया। मजदूर हड़ताल पर चले गए। अदालतों में वकील आना बंद हो गए। शहरों से लेकर गांव देहात में आंदोलन का असर दिखाई देने लगा। 

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद असहयोग आंदोलन के दौरान पहली बार हुआ जब अंग्रेजी राज की नींव हिल गई। पूरा आंदोलन अहिंसात्मक तौर पर चल रहा था। इसी बीच फरवरी 1922 में गोरखपुर के चौरी-चौरा में भीड़ ने एक पुलिस थाने पर हमला कर दिया। भीड़ ने थाने में आग लगा दी। इस कांड में कई पुलिसवाले मार गए। आंदोलन में हुई इस हिंसा से आहत गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया। इस आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई जागृति प्रदान की।

नमक सत्याग्रह
असहयोग आंदोलन के करीब आठ साल बाद महात्मा गांधी ने एक और आंदोलन किया। इस आंदोलन से अंग्रेज सरकार हिल गई। महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 को अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से दांडी गांव तक 24 दिन का पैदल मार्च निकाला। इस मार्च को दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह और दांडी सत्याग्रह के रूप में इतिहास में जगह मिली। 

दरअसल, 1930 में अंग्रेजों ने नमक पर कर लगा दिया था। महात्मा गांधी ने इस कानून के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। इस आंदोलन से गांधी जी नमक पर से ब्रिटिश राज के एकाधिकार को खत्म करना चाहते थे। 12 मार्च को शुरू हुआ ये ऐतिहासिक मार्च  6 अप्रैल 1930 को खत्म हुआ। इस दौरान गांधी जी और उनके साथ चल रहे आंदोलनकारी लोगों से नमक कानून को तोड़ने की मांग करते थे। 

कानून भंग करने के बाद सत्याग्रहियों ने अंग्रेजों की लाठियां खाईं लेकिन पीछे नहीं मुड़े। एक साल चले आंदोलन के दौरान कई नेता गिरफ्तार हुए। अंग्रेज इस आंदोलन से घबरा गए। आखिरकार 1931 को गांधी-इरविन के बीच हुए समझौते के बाद आंदोलन वापस हुआ और अंग्रेजों की दमकारी नमक नीति वापस ली गई।

हरिजन आंदोलन 
महात्मा गांधी जी ने 8 मई 1933 से छुआछूत विरोधी आंदोलन की शुरुआत की थी। इस दौरान महात्मा गांधी ने आत्म-शुद्धि के लिए 21 दिन का उपवास किया। इस उपवास के साथ एक साल लंबे अभियान की शुरुआत हुई। उपवास के दौरान गांधी जी ने कहा था- या तो छुआछूत को जड़ से समाप्त करो या मुझे अपने बीच से हटा दो। इससे पहले 1932 में गांधी जी ने अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना की थी। दलित समुदाय के लिए हरिजन नाम भी महात्मा गांधी ने दिया था। गांधी जी ने ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक पत्र का भी प्रकाशन किया था।


 
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अगस्त क्रांति - फोटो : PIB

भारत छोड़ो आंदोलन
9 अगस्त, 1942 को गांधी जी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' की शुरुआत की। मुंबई में हुई रैली में गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। आंदोलन शुरू होते ही अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों पर जमकर कहर ढाया। गांधी समेत कई बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। इस आंदोलन ने दूसरे विश्व युद्ध में उलझी ब्रिटिश सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी। अंग्रेजों को आंदोलन खत्म करने में एक साल से ज्यादा का समय लग गया।  यह भारत की आजादी में सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन था। 

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