अनेक उपलब्धियों के बाद भी हमें कई आंतरिक और बाह्य संकटों का न केवल सामना करना है, अपितु उसका समाधान भी ढूंढना है। भारत को अब भी समरसता के लिए और प्रयास करने होंगे क्योंकि समाज जितना समरस होगा, उतना सशक्त होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, मगर बड़ी आबादी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इसे और प्रगति करनी होगी। आज जब देश की स्वाधीनता को 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं तो इस अवसर पर देश का हर नागरिक उल्लसित है। हमारे देश ने तमाम व्यवधानों और संकटों को पार करते हुए इन 75 वर्षों की यात्रा तय की है। यह यात्रा अपने आप में रोमांचित करने वाली है। इस पावन अवसर पर देश की उपलब्धियां, चुनौतियां सभी हमारे सामने हैं। कैसे एक राष्ट्र ने स्वतंत्र होते ही विभाजन जैसी त्रासदी का सामना किया और विभाजन के कारण हुई हिंसा का दंश झेला। इसके तुरंत बाद सीमा पर आक्रमण का सामना किया, परंतु ये चुनौतियां हमारे राष्ट्र के सामर्थ्य को हरा नहीं पाईं। हमारा राष्ट्र इन चुनौतियों का सामना करते हुए अपने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करता रहा। आज हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि कैसे हमारे देश के नागरिकों ने विभाजन और आक्रमण के दुःख झेलने के बाद 1952 में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व को मनाया और भारत में लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना की।
यह भारतवासियों का सामर्थ्य और इच्छाशक्ति ही थी, जिसने 1947 के बाद लगातार भारत के छूटे हुए हिस्से गोवा, दादरा एवं नगर हवेली, हैदराबाद और पुडुचेरी को फिर भारत भूमि में मिलाने का प्रयास जारी रखा और अंत में नागरिक प्रयासों से लक्ष्य की प्राप्ति की। कई बार यह प्रश्न आता है कि एक राष्ट्र जिसको राजनीतिक स्वतंत्रता केवल कुछ वर्षों पूर्व मिली हो, यह सब इतनी जल्दी कैसे कर सकता है? इसको समझने के लिए हमें भारत के समाज को समझना होगा। भारतीय समाज सभी प्रकार के आक्रमण और संकट को सहते हुए भी अपनी एकता के सूत्र को नहीं भूला। यदि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समझने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि संघर्ष के पदचिह्न नगरों, ग्रामों, जंगलों, पहाड़ों व तटीय क्षेत्रों हर जगह मिलते हैं। चाहे संथाल विद्रोह हो या दक्षिण के वीरों का सशस्त्र संघर्ष, आपको सभी संघर्षों में एक ही भाव मिलेगा। सभी लोग किसी भी कीमत पर स्वाधीनता चाहते थे। यह स्वाधीनता वे केवल अपने लिए ही नहीं, अपितु अपने समाज और संपूर्ण राष्ट्र के लिए चाहते थे।
स्वाधीनता के लिए भारतीय समाज की व्याकुलता इतनी थी कि वह इसके लिए हर प्रकार के त्याग और हर प्रकार के मार्ग पर चलने का इच्छुक था। यही कारण है कि भारत की स्वतंत्रता के लिए लंदन, अमेरिका, जापान हर जगह से प्रयास हुए। लंदन स्थित इंडिया हाउस तो भारतीय स्वाधीनता का एक प्रमुख केंद्र बन गया था। भारत का स्वाधीनता आंदोलन इतना व्यापक था कि उसने भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक सभी विभाजनों के परे जाकर देश के जनमानस को एक किया। इसके लिए किसी एक का नाम लेना बेमानी होगा, क्योंकि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में अनेक लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। इनमें से कुछ का नाम हम जानते हैं और कुछ का नाम नहीं जानते हैं। इस आंदोलन के असंख्य नायक थे आैर हर नायक का मकसद एक ही था।
यही कारण है कि स्वाधीनता के बाद देश को परम वैभव की ओर ले जाने का भाव देश की जनता के मन में था और यह इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर नहीं था। इसी कारण जब देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमले का प्रयास, आपातकाल के रूप में हुआ तो देश की जनता ने उसकी संभाल की और स्वयं ही संघर्ष किया। स्वाधीनता के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर हमें यह भी विचार करना होगा कि स्वाधीनता के शताब्दी वर्ष तक हमारे लक्ष्य क्या होंगे? आज जब संपूर्ण विश्व कोरोना और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है तो एक राष्ट्र के रूप में हमारे क्या लक्ष्य होने चाहिए? इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछला दशक भारत के लिए अनेक उपलब्धियों से भरपूर रहा है। फिर चाहे वह भारत के नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करने का विषय हो या स्वास्थ्य, आवास और वित्तीय समावेशन का विषय हो, यह सब यही परिलक्षित करता है कि भारत का समाज सशक्त हो रहा है। यह भारत की मेधा शक्ति ही है, जिसने कोरोना के समय, सबसे कम समय में सबसे सस्ती और सबसे सुरक्षित वैक्सीन का निर्माण किया, जिसने पूरे विश्व की सहायता की और करोड़ों जीवन की रक्षा की।
इन सभी उपलब्धियों के बाद भी, भारतीय समाज और एक राष्ट्र के रूप में हमें कई आंतरिक और बाह्य संकटों का न केवल सामना करना है, अपितु उसका समाधान भी ढूंढना है। भारत को अब भी समरसता के लिए और प्रयास करने होंगे क्योंकि समाज जितना समरस होगा, उतना सशक्त होगा। इसलिए इस पर और भी कार्य करने की आवश्यकता है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था तमाम संकटों के बाद भी आगे बढ़ रही है, मगर भारत की बड़ी आबादी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इसे और तेजी से प्रगति करनी होगी। इसके लिए आवश्यक है कि हम भारतीय उद्योगों और उपक्रमों को बढ़ावा दें। इसके बिना हम भारत की रोजगार की अपेक्षा को पूरा नहीं कर पाएंगे। भारत सही मायने में तभी सशक्त होगा, जब देश स्वावलंबी होगा।
आज यह आवश्यक है कि हम विचार करें कि क्या भारत के नीति प्रतिष्ठान, वर्तमान में हमारी आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप हैं। अगर वह नहीं हैं तो उसमें परिवर्तन कैसे हो सकता है, इस पर भी विचार की आवश्यकता है। आज हम बहुत सी ऐसी व्यवस्था देखते हैं, जिसमें एक साधारण आदमी अपने को असहज और असमर्थ पाता है, चाहे वह आज की न्यायिक व्यवस्था हो या राजनीतिक व्यवस्था। ये एक साधारण आदमी की पहुंच में सहजता और सुलभता से कैसे पहुंचें, इस पर विचार करने की आवश्यकता है। भारत वैश्विक चुनौतियों का सामना तभी कर सकता है, जब उसकी आंतरिक व्यवस्था मजबूत हो। आंतरिक व्यवस्था आर्थिक आैर सामाजिक सशक्तीकरण पर निर्भर होती है। इसलिए भारत की आंतरिक व्यवस्था का समाधान भी आर्थिक और सामाजिक दोनों चुनौतियों के समाधान में ही निहित है।