देश में एक ओर नौकरी की किल्लत है तो दूसरी ओर दिग्गज कंपनियों की कमान हमारे युवाओं के हाथ में है। 54 फीसदी आबादी की उम्र 25 साल से कम है, तो 62 फीसदी की उम्र काम करने की है।
आज देश में करोड़ों युवा हर साल श्रम के लिए उपलब्ध हो रहे हैं। लेकिन जरूरी कौशल का अभाव उन्हें बेरोजगार रहने पर मजबूर कर रहा है।
दुनिया में दूसरे पायदान पर, आगे विस्तार की दरकार
स्टार्टअप और अरबों डॉलर की कंपनियों के दौर के साथ भारत कदमताल जरूर कर रहा है लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ लघु, सूक्ष्म व मध्यम उद्योग (एमएसएमई) वैसी रफ्तार नहीं पकड़ पाया। दुनिया में एमएसएमई के मामले में भारत दूसरे पायदान पर है और इनकी तादाद करीब साढ़े छह करोड़ है, जिनकी जीडीपी में 29 फीसदी हिस्सेदारी है। लेकिन कमजोर ढांचागत सुविधा, नवाचार का अभाव, कम कौशल व उत्पादकता और पर्याप्त वित्त संसाधन के अभाव में यह क्षेत्र अपेक्षित तरक्की नहीं कर पाया। इनमें से 99 फीसदी उद्योग जीवनभर लघु श्रेणी तक ही सीमित रह जाते हैं। अगर इन्हें मजबूत किया जाए तो ये देश के तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की मंजिल की राह आसान कर सकते हैं।
भारत का अमेरिका, चीन के बाद सबसे ज्यादा सवा पांच लाख करोड़ रुपये सैन्य खर्च
देश के लिए जान लुटाने वाले योद्धाओं की कभी कमी नहीं रही। कमी थी तो नए उपकरण और हथियारों की, जिन्हें रणभूमि में मिले सबक और संभावित खतरों के मद्देनजर हम पूरा करते रहे। आज अंग्रेजों (ब्रिटेन) को पीछे छोड़ हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति बन चुके हैं। इस ताकत की बदौलत ही चीन को घेरने के लिए बने क्वॉड जैसे समूहों में भारत को तवज्जो मिली है। हालांकि, रूस, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों पर हथियारों की निर्भरता ने हमारे आधुनिकीकरण के लिए जरूर चुनौती खड़ी की है।