मन की आजादी, सुकून की नींद और पेट भर भोजन के अलावा जिंदगी को खुलकर जीने के लिए और क्या-क्या चाहिए, यह सवाल हर इंसान को कभी न कभी परेशान जरूर करता है। आंखों में कभी-कभी इतने सपने मंडराने लगते हैं कि सोच का दायरा छोटा लगने लगता है।
आजादी की किलकारियां होठों से निकलकर चेहरे की हर लकीर से खुशबू बिखेरती हैं। इसी खुशबू में आजादी के रंग भी खिलते महसूस होते हैं। ऐसा लगता है कि जीवन से हंसने की आजादी छिन सी गई है। पहले जिंदगी बहुत स्वाभाविक थी, इसलिए आदमी खुलकर हर पल को जीता था। अब लोग इस तरह की जीवनशैली से परहेज करने लगे हैं।
डर रहता है कि खुलकर जीने से कहीं कमजोरियां बाहर न आ जाएं। हम किसी से मिलते भी हैं तो होंठों को एक इंच फैलाते हुए सिर झुकाकर 'हेलो' बोलने को ही अभिवादन समझ लेते हैं। बात-बात पर लगने वाले ठहाके नफासत की बनावटी मुस्कान में गुम हो गए हैं। जिंदगी की छोटी-मोटी घटनाओं में अब भी हंसी के लिए काफी गुंजाइश बची है, बशर्ते हम चेहरे की लकीरों से इसे आजाद करें।
रंग हमेशा अपने साथ उम्मीद का एक व्याकरण लेकर चलते हैं और उम्मीद का सीधा संबंध मनुष्य के स्वाभिमान, हक और आजादी से जुड़ा हुआ है। रंग जिंदगी का एक तजुर्बा है। किसी न किसी रंग से घिरे हैं हम। कई बार ये रंग हमें रास्ता भी दिखाते हैं और कई बार हमारे रास्ते को धुंधला भी करते हैं।
लेकिन रंग के बिना कोई संसार नहीं बसता और उम्मीदों के बिना किसी आजादी की बात पूरी नहीं हो सकती। इस उम्मीद के कई चेहरे हो सकते हैं। एक चेहरा धरती का भी हो सकता है। आकाश का भी। पानी, आग और हवा का भी। ध्यान से देखेंगे तो उस चेहरे में हरियाली का आंगन और पड़ोस की पगडंडी भी हो सकती है।
वहां जानवर, इंसान, और ईश्वर भी होंगे। सच की धूप होगी अपनी परछाई भी होगी और दूसरे की छाया भी। इन चेहरों के बीच से ही आजादी की राह निकलती है...जिस दिन जिंदगी के रंगों में डूबकर उम्मीदों के ये चेहरे सबके सामने होंगे...हमारी आजादी का वह सबसे बड़ा दिन होगा...और उस दिन आकाश में रंगों का सबसे बड़ा इंद्रधनुष खिलेगा।